मै एक वैश्यालय में पली बढ़ी, जहां सब तरफ देह व्यापर होता है.……।

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मै 12 साल की थी जब मुझसे पहलीबार मेरा रेट पुछा गया मै रोयी और सो गयी क्योकि मै ये सब समझती ही ना थी, पर क्या आप जानते हैं इस सब में सबसे बुरा क्या है ? लोग जो हमारा दाम लगाने आते हैं सब ऊँचे तबके के सभ्य कहे जाने वाले होते हैं और उन्हें लगता है की वो पैसे से सब कुछ खरीद सकते हैं, पर जो औरते वहां थी वो ही मेरा परिवार थी, जब माँ पास की फैक्ट्री में काम पर जाती थी वो सब अपनी बेटी की तरह मेरा ख्याल रखती थी, न जाने इतनी बदसलूकी सहने के बाद भी उनमे इतना प्यार इतनी दया कहां से आती थी, फिर भी मुझे हमेशा कम आत्मसम्मान के साथ रहना पड़ा क्योकि मै रंग में काली थी, मै कभी समझ ही न पायी की खूबसूरत होने के लिए गोरा होना ज़रूरी क्यों है, जब मैंने 12th पास किया मैंने बदलाव की ठान ली, मैंने अपने म्युनिसिपल स्कूल में लोगों को बताया की मै पढ़ना चाहती थी, इंग्लिश बोलना चाहती थी, और कुछ बनना चाहती थी, फिर मै एक संस्था ” क्रांति ” पहुंची

मैंने अपना अगला साल पूरे भारत में घूम – घूम कर यौन संबंधों पर जागरूकता के कार्यक्रम किये और तब मुझे एहसास कि सबको मेरे रंग या मेरी पृष्ठभूमि से फर्क नही पड़ता और मेरा आत्मबल बढ़ने लगा, क्योकि मै हमेशा जागती हुई आँखों से सपना देखती हूँ तो अक्सर तेज़ स्वर में कह पड़ती थी कि एक दिन मै अमेरिका जाउंगी तब तो मुझे ये भी नई पता था कि अमेरिका कोई द्वीप है देश है या राज्य, “क्रांति” के प्रयासों से मुझे ब्रैड कॉलेज में लिब्रेल आर्ट पढ़ने के लिए पूरी स्कॉलरशिप मिली, सबने मिलकर मेरे अन्य खर्चों की व्यवस्था की और मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया, अब मै शुद्ध इंग्लिश बोलने लगी हूँ और अपने घर को बदलने के बहुत सरे नए नए विचार हैं

और हाँ मेरे घर के बारे में अपनी सोच बदलो, स्वीकार करो की लोगों के पास विकल्प हैं और जानो बहुत सी महिलाएं वहां अपनी इच्छा से। … क्योकि ये उनकी रोज़ी रोटी का साधन है, हमें चीज़ों को आंकने से अधिक स्वीकार करने की ज़रूरत है जो हमारे लिए आसान नही हैं, …… क्योकि मेरी पृष्ठभूमि मेरी कमजोरी नही है………मै…….मै हूँ……………. कोई जगह ये कभी नही निर्धारित कर सकती की मै कौन हूँ……?

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