यह है दुनिया का अद्भुद शिवलिंग- साल भर में अपने आप ही घटता बढ़ता रहता है शिवलिंग का आकार और स्वरुप

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Image Courtesy – Devbhoomihimnchal

वैसे तो समूचे हिमाचल प्रदेश को ही देवभूमि के नाम से जाना जाता है I हिमाचल प्रदेश में हिन्दुओं के सर्वाधिक तीर्थस्थल है I लेकिन यहाँ पर एक ऐसा शिवलिंग है जो अपने आप दुनिया का एक अद्भुद शिवलिंग है I दुनिया के बड़े से बड़े वैज्ञानिक आज तक भी इस शिवलिंग की सच्चाई के बारे में पता नहीं कर सकें है I आपको बता दें कि यह पवित्र शिवमंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित इंदौरा उपमंडल में काठगढ़ महादेव के नाम से पूरे संसार में प्रसिद्द है I

 

ज्ञात हो कि यह पूरी दुनिया का एक मात्र ऐसा शिवलिंग है जो इस स्वरुप में है I आपको बताते चलते है कि यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित है इसका एक भाग छोटा और एक उस भाग से थोडा बड़ा है I भोलेनाथ के इस शिवलिंग को अर्धनारीश्वर के नाम से भी जाना जाता है I आपको बता दें कि जैसे-जैसे माता पार्वती और भोलेनाथ के नक्षत्रों में परिवर्तन होता है ठीक उसी प्रकार इस शिवलिंग में भी परिवर्तन होते रहते है I परिवर्तन कुछ इस प्रकार से होता है कि शिवलिंग के दोनों जो भाग आपस में मिले होते है उनके बीच अपने आप ही अंतर घटने या फिर बढ़ने लगता है I सबसे बड़ी चमत्कार वाली बात यह है कि ग्रीष्म ऋतु में यह स्वरूप दो भागों में बंट जाता है और शीत ऋतु में पुन: एक रूप धारण कर लेता है।
शिवपुराण में भी है इस शिवलिंग का वर्णन –
हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थ शिवपुराण में भी इस शिवलिंग के बारे में विस्तृत जानकारी दी गयी है I ज्ञात हो कि शिव पुराण की विधेश्वर संहिता के अनुसार एक भगवान् ब्रम्ह देव और विष्णु भगवान् के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया I दोनों ने ही इस विवाद को सुलझाने के लिए अस्त्र-शस्त्र उठा लिए तभी वहां पर यह भयंकर स्थिति देख शिव सहसा एक आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हो गए, जिससे दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वत: ही शांत हो गए।

 

तब दोनों ही देवताओं के द्वारा यह तय किया गया कि सबसे पहले इस शिवलिंग के एक छोर का पता लगा लेगा वही सर्वाधिक श्रेष्ठ होगा I और तब ब्रह्मा और विष्णु दोनों उस स्तंभ के आदि-अंत का मूल जानने के लिए जुट गए। विष्णु शुक्र का रूप धरकर पाताल गए, मगर अंत न पा सके। ब्रह्मा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले- ‘मैं स्तंभ का अंत खोज आया हूं, जिसके ऊपर यह केतकी का फूल है।

ब्रह्मा जी का यह छल देखकर भगवान् भोलेनाथ प्रकट हो गए और उन्होंने दोनों ही देवों से कहा कि आप दोनों ही श्रेष्ठ है और तभी भोलेनाथ शंकर ने कहा था कि कालांतर में यही शिवलिंग (अग्नि के समान स्तंभ) काठगढ़ शिवलिंग के रूप में जाना जाने लगा। ईशान संहिता के अनुसार इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था।

चूंकि शिव का वह दिव्य लिंग शिवरात्रि को प्रगट हुआ था, इसलिए लोक मान्यता है कि काठगढ महादेव शिवलिंग के दो भाग भी चन्द्रमा की कलाओं के साथ करीब आते और दूर होते हैं। शिवरात्रि का दिन इनका मिलन माना जाता है।

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Image Courtesy – Amritsartemple

त्रेता युग में भरत जी भी पूजा करते थे इस परम पवित्र शिवलिंग की –

मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान भरत जी जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश (कश्मीर) जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते हुए ही जाते थे।

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