असीरगढ़ का किला – आज भी भटकते हैं अश्वत्थामा, किले के शिवमंदिर में प्रतिदिन करते है पूजा

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महाभारत जिसके बारे में हिंदू धर्म का शायद ही ऐसा कोई शख्स होगा जो नहीं जनता होगा, हर घर में महाभारत और रामायण के किस्से बच्चे-बच्चे को उनकी दादी-नानी और माता-पिता के द्वारा सुनाये ही जाते हैं I जो जिन लोगों को महाभारत के सम्बन्ध में जानकारी हो और उन्हें अश्वत्थामा के बारे में पता न हो यह बात असंभव ही हैं I

अश्वत्थामा महाभारत के मुख्य चरित्रों में से एक थे और वह महाभारत के अंत में कौरवों की तरफ से जीवित बचने वाले प्रमुख योद्धाओं में से भी एक थे I लेकिन आपको बता दें कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद अश्वत्थामा की एक गलती ने उन्हें युगों-युगों तक भटकते रहने के लिए विवश कर दिया हैं I ऐसा कहा जाता है कि आज भी अश्वत्थामा मध्यप्रदेश के असीरगढ़ किले में बने शिवमंदिर में प्रतिदिन आते है I और वैसे भी हम आपको बता दें कि असीर गढ़ के किले में बने इस शिवमंदिर में रोजाना सुबह तडके-तडके अपने आप ही पूजा हो जाती है और ताजे गुलाब के पुष्प भी भोले नाथ के ऊपर चढ़े हुए रहते हैं I यह पूरी घटना आज भी एक रहस्य है और इस बारे में दुनिया की कोई भी ताकत कोई पुख्ता जानकारी या फिर कहें तो साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया है I

कौन थे अश्वत्थामा –

अश्वत्थामा शास्त्र और शस्त्र विद्या के महान ज्ञाता तथा पांडवों और कौरवों के महान गुरु द्रोणाचार्य जी के पुत्र थे I अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र के साथ ही साथ कौरवों के कुल गुरु कृपाचार्य के भांजे भी थे क्योंकि कृपाचार्य की बहन जिसका नाम कृपी था उसका विवाह द्रोणाचार्य के साथ हुआ था और अश्वत्थामा उन्ही कृपी और द्रोणाचार्य की इकलौती संतान थे I

गुरु द्रोण ने ही कौरवों तथा पांडवों को युद्ध, धर्म, शास्त्र आदि की शिक्षा भी दी थी उन्हें हर क्षेत्र में निपुण और विद्वान् बनाया था I अपने पिता की ही भांति अश्वत्थामा भी एक महान योद्धा और शास्त्र तथा शस्त्र का महान ग्यानी था I और महाभारत के युद्ध के समय अश्वत्थामा ने भी अपने पिता के साथ कौरवों की तरफ युद्ध किया था I

महाभारत के युद्ध के दौरान जा भीष्मपितामह घायल होकर सरसय्या पर पड़े हुए थे तो युद्ध के 11 वें दिन गुरु द्रोण को कौरवों का सेनापति नियुक्त किया गया था I गुरु द्रोण ने सेनापति बनते ही अपनी अद्वतीय व्यूह रचनाओं से पूरी की पूरी पांडवों की सेना को नष्ट भ्रष्ट करना प्रारंभ कर दिया था I पांडवों की भीषण छति देखकर श्रीकृष्ण ने युद्धिष्ठिर् को कूटनीति का सहारा लेने की सलाह दी I जिसके तहत युद्ध भूमि पर यह फैला दिया गया कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का वध भीम ने कर दिया है I ऐसा सुनकर जब गुरु द्रोणाचार्य दुःख से व्याकुल हो उठे और अपने पुत्र की आत्मा की शांति के लिए ध्यान लगाने लगे तब द्रुपद के पुत्र ने छल से गुरु द्रोणाचार्य का वध कर दिया था I

आखिर क्यों दे दिया भगवान् श्री कृष्ण ने गुरु पुत्र को इतना भयंकर श्राप –

कहा जाता है कि अश्वत्थामा को इस बात की जानकारी प्राप्त हुई कि उसके पिता को धोखे से उसकी म्रत्यु का झूठा समाचार बता कर मारा गया है तब वह क्रोध से व्याकुल हो उठा और उसने युद्ध की समाप्ति के बाद रात में पांडवों के शिविर में घुसकर उनके सोते हुए सभी पांडव पुत्रों का वध कर दिया था I और इतना ही नहीं उसने जब पांडवों का समूल विनाश करने की शपथ की थी इसीलिए उसने पांडवों के इन बालकों का वध किया था I लेकिन इसके बाद जब अश्वत्थामा को यह पता चला कि अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पांडवों का वंश बच गया है तो उसने उसके ऊपर भी अपने दिव्य अस्त्र का प्रयोग कर दिया लेकिन उत्तरा के गर्भ की रक्षा स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने की और साथ अश्वत्थामा के मस्तक पर विराजमान मणि को निकाल लिया और साथ ही अश्वत्थामा को चिर काल तक ऐसे ही पृथ्वी पर भटकने का श्राप दे दिया I कहते है तब से लेकर आज तक अश्वत्थामा इसी तरह से भटक रहे है I

 

प्रतिदिन अश्वत्थामा आते है पूजा करने के लिए –

अगर हम स्थानीय निवासियों की माने तो उनके अनुसार प्रतिदिन अश्वत्थामा गुप्तेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिए आते है लोगों का ऐसा मानना है कि अश्वत्थामा किले के भीतर ही स्थित तालाब से स्नान करने के बाद भगवान् भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए आते है I जबकि कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि अश्वत्थामा जबलपुर में बहने वाली उतावली नदी में स्नान करके गुप्तेश्वर मंदिर में पूजा करने के लिए अश्वत्थामा आते है I

बात जो कुछ भी यह तो कोई नहीं जानता लेकीन इतना जरूर है कि आज भी जिस गुप्तेश्वर मंदिर में कोई आधुनिक बिजली या फिर प्रकाश की सुविधा नहीं है उस मंदिर में आज भी प्रतिदिन पूजा व अर्चना जारी है I सुबह सवेरे ही जब भी आप जाइए उस मंदिर में भोलेनाथ की शिवलिंग के ऊपर गुलाब और गुलाल तथा जल चढ़ा हुआ मिलता है I

आपको बता दें कि यह मंदिर मंदिर चारो तरफ से खाइयों से घिरा है। लोगों का यह भी कहना है कि इन्हीं खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ सीधे इस मंदिर में निकलता है।

जो भी एक बार देख लेता है हो जाता है पागल –

स्थानीय निवासियों की माने तो उनके दादा-परदादा ऐसा कहते है कि जो भी एक बार अस्वत्थामा को देख लेता है उसका अक्सर मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है I इसके अलावा भी लोगों का ऐसा मानना है कि अस्वत्थामा कभी-कभी जो लोग कभी उनसे मिल जाते है उनसे वह हल्दी और तेल मांगते है ऐसा इसलिए क्योंकि उनके माथे से रक्त बहता रहता है उसको बंद करने के लिए वह ऐसा मांगते है I

यह मात्र एक किवदंती है या फिर इनके पीछे कुछ वास्तविकता है इस सम्बन्ध में हम कुछ भी नहीं कह सकते है लेकिन स्थानीय निवासियों का जो कहना है उसे हम आपके सामने रख रहे है I

वेदों में वर्णित अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं अश्वत्थामा
महाभारत के इस प्रमुख पात्र के बारे में ऊपर प्रमुख जानकारी दी जा चुकी है I अब हम आपको बता रहे एक श्लोक के माध्यम से कि दुनिया में किन 8 लोगों को चिर काल तक अमर रहने का आशीर्वाद प्राप्त है I

इस श्लोक को पढ़ें –
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय- ये आठों अमर हैं।
असीरगढ़ (बुरहानपुर) पहुँचने के लिए आवश्यक जानकारी इस प्रकार है –
असीरगढ़ किला बुरहानपुर से लगभग 20 किमी की दूरी पर उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाडिय़ों के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। बुरहानपुर खंडवा से लगभग 80 किमी दूर है। यहां से बुरहारनपुर तक जाने के लिए ट्रेन, बसें व टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं।

यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर है, जो करीब 180 किमी दूर है। बुरहानपुर मध्य प्रदेश के सभी बड़े शहरों से रेल मार्ग द्वारा जुड़ा है।

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