बदरी धाम : जानिये आखिर क्यों पड़ा इस पवित्र तीर्थ स्थल का नाम बदरीधाम ….

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श्री हरि भगवान विष्णु का बदरीनाथ नाथ का पवित्र मंदिर जिसे बदरी नारायण या फिर बद्रीविशाल का भी मंदिर कहा जाता हैं हिन्दुओं के चार प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक प्रमुख तीर्थ हैं I

कैसे पड़ा इस पावन तीर्थ का नाम बदरीनाथ धाम –

हमारी पुरानी पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं भगवान विष्णु ने घोर तपस्या की थी, उसके बारे में कुछ इस प्रकार से मान्यता हैं कि एक भगवान् विष्णु अपनी योगसाधना के लिए हिमालय क्षेत्र में विचरण कर रहे थे तभी उन्होंने इस पवित्र और मनोरम, शांत स्थान को देखा और उन्होंने अपने ह्रदय में यह निश्चिय किया कि अब वह अपनी योगसाधना यही पर करेंगे I

बदरीनाथ का पवित्र मंदिर
बदरीनाथ का पवित्र मंदिर

लेकिन यह स्थान तो भगवान् शंकर और माता पार्वती का पवित्र केदार धाम था इसलिए बिना उनकी इज़ाज़त के यहाँ पर योग साधना करना उनकी अवहेलना होती अतः सर्वग्यानी भगवान विष्णु ने निश्चय किया कि अब तो पहले देवों के देव महादेव जगत हन्ता भगवान् शंकर से और माता पारवती से आज्ञा ले ली जाय और यह निश्चय कर भगवान विष्णु ने एक छोटे से बालक का रूप धारण कर उसी पर्वत के ऊपर रोने लगे I

एक बालक का इस प्रकार से करुण क्रंदन सुन और देख माता पार्वती का ह्रदय द्रवित हो गया वह तुरंत ही भगवान् शंकर के साथ उस बालक के सामने उपस्थित हुई और उनसे पूछा की कहो वत्स तुम्हे क्या चाहिए तभी भगवान् विष्णु ने कहा कि माता मुझे यह स्थान अपनी योग साधना के लिए चाहिए, बालक के इस तरह से निश्छल अनुरोध पर माता पार्वती और भगवान् शंकर ने उस स्थान को भगवान विष्णु को दे दिया और वहां से अंतर्धान हो गए I

अलकनंदा नदी
अलकनंदा नदी

तदुपरांत भगवान् विष्णु ने वहीँ पर अपनी कठोर योग साधना प्रारंभ कर दी उनकी योग साधना ऐसे थी कि उन्हें ऊपर से गिर रही बर्फ का कोई भी एहसास नहीं हुआ और वह लगातार बर्फ के अन्दर ही समाहित होते जा रहे थे, यह देख माता लक्ष्मी का ह्रदय द्रवित हो उठा और वह तुरंत ही वहां पर उपस्थित हो गयी और उन्होंने एक बदरी के वृक्ष (जिसे आज हम बेर कहते हैं) का रूप धारण कर भगवान विष्णु को छाया प्रदान करने लगी और ऊपर गिर रही समस्त बर्फ को उन्होंने अपने ऊपर धारण कर लिया I जब काफी समय के बाद भगवान् विष्णु अपनी योगसाधना से बाहर आये तो उन्होंने देखा कि देवी लक्ष्मी एक बदरी के वृक्ष के रूप में उनके ऊपर गिर रही समस्त बर्फ को अपने ऊपर धारण कर बिलकुल ढक चुकी हैं तो उन्होंने प्रस्सन होकर कहा देवी आपने तो मुझसे भी अधिक तपस्या की हैं, अगर आप ऐसा नहीं करती तो शायद मेरी योग साधना पूरी होने में कठिनाई होती, चूँकि आपने मेरी ही तरह यहाँ पर तपस्या की हैं इस लिए इस स्थान को अब आज से सबसे पहले आपके नाम से फिर मेरे नाम से जाना जाएगा चूँकि देवी लक्ष्मी ने बदरी का रूप धारण कर भगवान् के ऊपर छाया की थी इसीलिए इस स्थान को बदरीनाथ अर्थात बदरी के नाथ अर्थात माता लक्ष्मी के नाथ भगवान् विष्णु का पवित्र स्थान माना जाता हैं I

कैसे जाए बदरीनाथ मंदिर मंदिर तक –

बदरीनाथ का मंदिर पवित्र अलकनंदा नदी के किनारे भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित हैं, यह स्थान हिन्दुओं के एक और पवित्र तीर्थ स्थल ऋषिकेश से 294 किलोमीटर उत्तर दिशा में हैं I ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

पूजा का महत्तव –

बदरीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय क्षेत्र में हिन्दुओं का मुख्य यात्रा धाम है। इस मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और हमेशा यहाँ पर अखण्ड दीप जलता रहता है, जिसे अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक माना जाता है। यहाँ पर श्रधालुओं के द्वरा तप्तकुंड में स्नान किया जाता हैं और भगवान् बदरी नारायण को यहाँ पर वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

भगवान् बद्रीविशाल के मंदिर को दूसरा चित्र
भगवान् बद्रीविशाल के मंदिर को दूसरा चित्र

पौराणिक कथा –

बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, यहाँ पर भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। जिस समय बौद्ध तिब्बत जाने लगे उन्होंने इस मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक दिया। जहाँ से इसे आदिदेव शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर श्री रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

आदि शंकराचार्य का काल्पनिक फोटो
आदि शंकराचार्य का काल्पनिक फोटो

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार –

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी. की दूरी पर स्थित बदरीनाथ शिखर कि ऊँचाई 7,138 मीटर है। बदरीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बदरीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।

 

बदरीनाथ में तथा इसके समीप अन्य दर्शनीय स्थल हैं-

  • अलकनंदा के तट पर स्थित तप्त-कुंड
  • धार्मिक अनुष्टानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक समतल चबूतरा- ब्रह्म कपाल
  • पौराणिक कथाओं में उल्लिखित सांप (साँपों का जोड़ा)
  • शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड–शेषनेत्र
  • चरणपादुका :- जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं; (यहीं भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था।)
  • बदरीनाथ से नज़र आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ।
  • माता मूर्ति मंदिर :- जिन्हें बदरीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है।
  • माणा गाँव- इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
  • वेद व्यास गुफा, गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था।
  • भीम पुल :- भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।
  • वसु धारा :- यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से ८ किलोमीटर दूर है। कहते हैं की जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है।
  • लक्ष्मी वन :- यह वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
  • सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) :- कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।
  • अलकापुरी :- अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
  • सरस्वती नदी :- पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही यह नदी प्रकट रूप में है।
  • भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मंदिर है।
  • बदरीनाथ मंदिर के ऊपर शेषनाग की आकृति में पर्वत शिखर
    बदरीनाथ मंदिर के ऊपर शेषनाग की आकृति में पर्वत शिखर

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एक विचित्र सी बात है।.. जब भी आप बदरीनाथ जी के दर्शन करें तो उस पर्वत (नारायण पर्वत) की चोटी की और देखेंगे तो पाएंगे की मंदिर के ऊपर पर्वत की चोटी शेषनाग के रूप में अवस्थित है। शेष नाग के प्राकृतिक फन स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

photo credit – uttarkhand blogspot.com and and blessings.com

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