सम्राट अशोक (काल ईसा पूर्व 269 – 232)

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सम्राट अशोक प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के एक प्रतापी राजा थे, सम्राट अशोक को देवानाम्प्रिय एवं प्रियदर्शी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। सम्राट अशोक के शाशन काल में मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की पर्वत श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल पश्चिम में अफगानिस्तान तक फैला हुआ था।

सम्राट अशोक का प्रतीतात्मक फोटो व उनके राज्य का नक्सा
सम्राट अशोक का प्रतीतात्मक फोटो व उनके राज्य का नक्सा

सम्राट अशोक का जन्म लगभग 304 ई. पूर्व माना जाता हैं। सम्राट अशोक के पिता का नाम बिंदुसार तथा माता के नाम में भी कई तरह से भ्रांतियां हैं कुछ लेखों के अनुसार अशोक की माता का नाम धर्मा कहा जाता हैं, सम्राट बिन्दुसार के पुत्रों में शासन को लेकर आपस में प्रतिस्पर्धा थी, अशोक बचपन से ही सैन्य गतिविधिओं में बहुत प्रवीण था, अशोक को एक अपने भाई सुशीम के क्षेत्र में हुए विद्रोह से प्रसिद्धि मिली थी, सुशीम के कहने पर ही राजकुमार अशोक को तक्षशिला में हुए विद्रोह को दबाने के लिए भेजा गया और जब विद्रोहियों को यह पता चला की अब उनका सामना अशोक से होने वाला हैं तो उन्होंने बिना किसी शर्त के ही विद्रोह को समाप्त कर दिया, इसी बात से यह अनुमान लगाया जा सकता हैं कि अशोक प्रारंभ से ही कितने चपल सेनानायक थे।

अशोक की बढती हुई कीर्ति को देखकर उसके भाई सुशीम को शासन हाथ से जाने का खतरा लगा और उसी के कहने पर अशोक को राजधानी से दूर कलिंग भेज दिया गया, कलिंग में अशोक को मत्स्यकुमारी कौर्वकी से प्यार हो गया। और वहीँ बाद में अशोक ने उससे विवाह कर लिया तथा उसे अपनी दूसरी या तीसरी रानी बना लिया।

इसी दौरान पता चलता है कि उज्जैन में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी तभी राजा बिन्दुसार ने अशोक को पुनः निर्वास से वापस बुला लिया और अशोक को पुनः उज्जैन के विद्रोह को कुचलने के लिए भेज दिया गया हालाँकि अशोक के सेनापतियों ने ही यहाँ पर हुए विद्रोह को कुचल दिया और अशोक की पहचान को गुप्त रखते हुए उसे छिपा दिया गया क्यों कि अशोक को उसी के भाई सुशीम के द्वारा मारे जाने का भय था, इस दौरान अशोक बौद्ध सन्यासियों के साथ मठों में रहा, इसी दौरान उसे बौद्ध धर्म के बारे में तथा शिक्षाओं के बारे में पता चला, यही पर एक अपूर्व सुंदरी कन्या जिसका नाम देवी था से अशोक को प्रेम हो गया और कुछ दिन उपरांत अशोक ने उससे भी विवाह कर लिया।

जिस समय अशोक आश्रमों और मठों में छुप कर अपना जीवन ब्यतीत कर रहे थे उसी समय अशोक को पता चला कि उसके सौतेले भाइयों ने उसकी माता की हत्या कर दी हैं, उधर राजा बिंदुसार भी वृद्ध हो चुके थे और प्रजा तथा सरदार, सेनापति और सामंत भी सुशीम से तंग आ चुके और उन लोगों ने अशोक को राज्य हथियाने के लिए प्रोत्साहित किया, उन सभी के सहयोग से अशोक ने राज महल पर अचानक धावा बोलकर अपने सौतेले भाइयों की हत्या कर दी और स्वयं शासक बन गया ।

सिंघासन को संभालते ही अशोक ने सर्वप्रथम अपना राज्य विस्तार करना प्रारंभ किया, अशोक ने मात्र 8 से 10 वर्षों में ही अपना राज्य सम्पूर्ण पूर्वी भारत से लेकर ईरान तक फैला दिया ।

सम्राट अशोक के शासन काल में मौर्य सल्तनत अपने चरम पर पहुँच चुकी थी, यह राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन और बाद में बौद्ध धर्म अपनाने तथा उसका प्रचार करने के लिए भी जाना जाता हैं। अपने जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध के भक्त हो गए थे उन्ही की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ बनवाया था जो आज भी नेपाल में भगवान बुद्ध की जन्मस्थल -लुम्बिनी में अशोक स्तम्भ के रूप में जाना जाता है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत और भारत के बाहर श्रीलंका, अफगानिस्तान, सम्पूर्ण पश्चिम एशिया, मिश्र तथा यूनान में भी करवाया था। सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अलग-अलग देशों में भेजा था ।

सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया लौह स्तम्भ
सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया लौह स्तम्भ

सम्राट अशोक ने अपने शासन काल के दौरान ही कलिंग पर आक्रमण किया, कलिंग युद्ध के दौरान कहा जाता हैं कि इस युद्ध में लगभग पच्चास हजार लोगों को बंदी बनाया गया था और लगभग एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी थी, इस भीषण रक्त-पात को देखकर अशोक के मन में वैराग्य की भावना उत्पन्न हो गयी और यही अशोक ने प्रतिज्ञा की कि अब वह कभी भी किसी राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा और इसी के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान् बुद्ध के चरणों में समर्पित करते हुए लोगों की सेवा करने लगा …

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