कांग्रेस के सत्ता में आते ही देश में हो गयी थी घोटालों की शुरुवात, युद्धकाल में भी सेना से जुड़े घोटाले में लिप्त रही नेहरु सरकार

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Ph. Studio/May, 57, A22a(I)/A22(l) The Prime Minister Shri Jawaharlal Nehru being received on his return from Ceylon at Palam Airport New Delhi by Shri V.K. Krishna Menon Union Defence Minster on May 20, 1957.
Ph. Studio/May, 57, A22a(I)/A22(l)
The Prime Minister Shri Jawaharlal Nehru being received on his return from Ceylon at Palam Airport New Delhi by Shri V.K. Krishna Menon Union Defence Minster on May 20, 1957.

जीप स्कैम वर्ष 1948- कार्यकाल पंडित जवाहर लाल नेहरु – आरोपी – वी के कृष्णा मेनन ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन राजदूत बाद में भारत के रक्षामंत्री नतीजा भारत 1962 में चीन से युद्ध हार गया

घोटाला और कांग्रेस इन दोनों का चोली दामन का साथ रहा है | कांग्रेस की उतपत्ति और देश की आज़ादी दोनों के साथ यह बिलकुल ऐसे चिपका हुआ है जैसे चोली संग दामन, शायद तभी देश की आज़ादी के बाद जो क्रम शुरू हुआ था वह आज भी बंद नहीं हुआ है और देश को एक के बाद एक घोटालों की आग में जलना पड़ा है |

दरअसल आपको बता दें कि जैसे ही 15 अगस्त 1947 को भारत के लोगों ने सदियों बाद स्वतंत्रता का एहसास किया वैसे ही देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के सबसे ख़ास लोगों में से एक वीके कृष्णा मेनन ने भारत को एक स्कैम यानी घोटाले का स्वाद भी चखा दिया | आज़ाद भारत के इस पहले घोटाले का नाम था जीप स्कैम यानी जीप घोटाला | यह घोटाला आज़ाद भारत का पहला ऑफिसियल या फिर कहें तो पहला सरकारी घोटाला था |

जीप घोटाला-
जीप घोटाला आज के समय में इसे सुनकर काफी अजीब लगता है कि क्या यार ! इतना छोटा सा घोटाला करने से क्या फायदा लेकिन आपको बता दें कि जिस वक्त यह घोटाला हुआ था उस समय भारत की स्थित ऐसी नहीं थी, भारत जैसे तैसे आगे बढ़ रहा था | पिछले 300 सालों से अंग्रेजों ने न केवल भारत को लूटा था बल्कि भारत के किसान मजदूर, रोजगार सब कुछ को खोखला भी कर दिया था और जाते-जाते उन्होंने भारत को बाँट कर दो टुकड़ों में बाँट दिया और न केवल बाँट दिया बल्कि भारत और पाकिस्तान को एक दुसरे के समक्ष दुश्मन की भांति खड़ा भी कर दिया | भारत और पाकिस्तान के बीच मुख्य मुद्दा था कश्मीर |

जैसे ही पाकिस्तान जिन्ना के नेत्रत्त्व में बना वैसे ही पाकिस्तानी सेना ने कबालियों के साथ मिलकर कश्मीर पर धावा बोल दिया और आधे से ज्यादा कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया था | ऐसे में भारतीय सेना को अपने सैनिकों को लाने ले जाने और युद्ध भूमि में आगे बढ़ने के लिए जीपों की आवश्यकता थी | भारत सरकार ने इसके लिए तुरंत ही विश्व के सबसे सम्रध राष्ट्र ब्रिटेन की एक कंपनी से अपनी सेना के लिए जीप खरीदने की बातचीत करने के लिए ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन राजदूत वीके कृष्णा मेनन को जिम्मेदारी दी गयी |

वीके कृष्णा मेनन ने भारत के साथ किया धोखा –
बता दें कि भारत सरकार ने 200 जीपों को खरीदने का आदेश दिया था | और इसकी कीमत तय हुई थी 80 लाख | इस पूरे प्रकरण में वीके कृष्णा मेनन ने सभी प्रोटोकाल को तोड़ते हुए अपनी तरफ से सामने आकर कंपनियों के साथ समझौता किया | वीके कृष्णा मेनन ने कंपनियों के बारे में बिना किसी इन्क्वारी किये हुए ही उनसे सेना के लिए जीप खरीदने का निर्णय ले लिया और कंपनियों को 80 लाख रूपये की पूरी पेमेंट भी कर दी गयी |

लेकिन आपको बता दें कि जब वर्ष 1949 में जीपों की पहली खेप मद्रास बंदरगाह पर पहुंची तो देखा गया है कि एक भी जीप ऐसी नहीं थी जो चलने की हालत में थी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सरकारी विभागों के ऊपर दबाव बनाया और जीपों को लेने के लिए विवश कर दिया | लेकिन तभी वी के कृष्णा मेनन के ऊपर घोटाले के गंभीर आरोप लगाये गए | विपक्ष ने इस मुद्दे पर कड़ा एतराज जताया और मेनन के ऊपर कार्यवाही की बात भी कही गयी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु जिनकी उस समय संसद के भीतर और बाहर तूती बोलती थी उन्होंने विपक्ष की एक भी नहीं सुनी | सबसे बड़ी बात यह थी कि उस समय विपक्ष की संख्या भी बहुत कम थी जिसके चलते विपक्ष को किनारे कर दिया गया |

बता दें कि विपक्ष को शांत करने के लिए अनंतसायनम की अध्यक्षता में कथित तौर पर एक जांच कमेटी बनाई गयी | हालाँकि बाद में 30 सितंबर 1955 को सरकार ने इस जांच कमेटी को बिना नतीजे पर पहुंचे ही बंद कर दिया | यह बता दें कि जब इस कमेटी को बंद किया गया था तब यूनियन मिनिस्टर जीबी पन्त ने संसद में घोषणा की थी कि, ‘सरकार इस मामले को समाप्त करती है | हालंकि जवाहर लाल सरकार की इस मामले में बहुत आलोचना हुई थी |

घोटाले के आरोपी को बनाया रक्षामंत्री और हार गए चीन से युद्ध –
बता दें कि ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन हाई कमिश्नर वीके कृष्णा मेनन जिनके ऊपर घोटाले का आरोप था को जवाहर लाल ने बाहर नहीं निकाला और न ही कोई कार्यवाही ही की बल्कि उन्होंने 3 फरवरी 1956 को मेनन को अपनी केबिनट में शामिल कर लिया जिन्हें पहले कोई भी मंत्री पद नहीं दिया गया लेकिन बाद में उन्हें देश की सुरक्षा यानी रक्षा विभाग का मंत्री बनाया गया | इस पद में आने के बाद सेना के अधिकारियों में और मेनन में कभी कोई अच्छे संबंध नहीं रहे | परिणाम यह हुआ कि जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था तो भारत को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था | जिसके बाद में मेनन को अपने रक्षामंत्री के पद से स्तीफा देना था | आज भी दिल्ली में वीके मेनन के नाम से कांग्रेस सरकार ने सडकें बनवाई है |

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