अद्भुत है प्रशासन की लीला, एक ही गांव के 4 नाम

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वाराणसी: इस गांव की समस्या दुख-दर्द है कोई सुनने वाला पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुजर गए आज तक इस गांव की समस्या का निदान किसी के पास नहीं है| यहां के ग्राम प्रधान ने गांव के विकास के लिए एड़ी से चोटी लगा दिया फिर भी आज तक इस गांव की गंभीर समस्या का निदान आज तक किसी सरकार ने नहीं किया| कितनी सरकार आई गई वाराणसी जिला प्रशासन ने भी इस गांव की गंभीर समस्या का हल आज तक नहीं निकाला, जिसका खामियाजा यहां के ग्रामीण कई पीढ़ियों भुगतते और झलते चले आ रहे हैं| शासन-प्रशासन को गांववासियों की इस गंभीर समस्या का निदान करने की अति आवश्यकता है|

आखिर यह गांव वाले जाएं तो जाएं कहां कौन सुनेगा इनकी फरियाद-

भारत का एक ऐसा अनोखा गांव है, जिसके अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड्स में चार नाम हैं। 1978 में इस गांव के लक्ष्मण प्रसाद ने दुबई से एक चेक भेजा था, जो बांग्लादेश के ढाका पहुंच गया था। जब dainikbhaskar.com ने इस गांव रियालिटी चेक किया तो पता चला कि इस गांव में आज तक बैंक, पोस्ट ऑफि‍स और टेलीफोन लाइन तक नहीं पहुंच सकी है।

ये हैं गांव के 4 नाम-

गांव, वाराणसी से 30 किलोमीटर दूर अजगरा विधानसभा में चोलापुर ब्लाक के चौबेपुर थानाक्षेत्र का ढकवा गांव है। ये गांव अलग-अलग विभागों में ढकवा, दाखा, ढाका, ढाखा नाम से रिकॉर्ड है। हमने गांव के प्रधान सत्यनारायण निषाद की पत्नी सुनीता देवी के कुछ रिकॉर्ड्स चेक किए। सुनीता के बैंक पासबुक और फोटो वोटर स्लिप में ढकवा, वोटर आईडी में दाखा, कम्प्यूटराइज खतौनी में ढाका और मैनुअल खतौनी में ढाखा दर्ज है। इसी तरह यहां के प्राइमरी स्कूल के ऊपर ढकवा तो सरकारी शिलापट्ट में ढाका दर्ज है। यहां के लोगों की मानें इसी गड़बड़ी की वजह से आजतक गांव का विकास नहीं हो पाया।

बांग्लादेश पहुंच गया चेक-

गांव के रहने वाले लक्ष्मण प्रसाद ने बताया, ”मैंने साल 1978 में दुबई से एक चेक अपने गांव भेजा था, जो बांग्लादेश के ढाका पहुंच गया था। मुझे दुबई में काफी परेशानी हुई, फिर वहीं बैंक से क्लियरेंस के बाद 2 महीने बाद मेरा चेक मुझे मिला।”

सरकार से एक नाम रखने की मांग-

ग्राम प्रधान सत्य नारायण निषाद ने बताया, गांव के अलग-अलग नामों की वजह से यहां का समुचित विकास नहीं हो पा रहा। सरकारी रिकॉर्ड्स की जांचों में भी काफी दिक्कतें आती हैं। इसी वजह से एनएच (नेशनल हाईवे) में गावों की जमीन अधिग्रहण में समुचित सर्किल रेट नहीं मिल पा रहा है। हमारी सरकार से मांग है कि गांव का एक ही नाम किया जाए। गांव में एक पंचायत भी होगी, जिसमें तय होगा कि नाम क्या रखा जाए। शिक्षामित्र प्रमोद कुमार शर्मा ने कहा, अलग-अलग नामों की वजह से के कारण इस गांव विकास रुक गया है। गांव में आजतक पंचायत भवन नहीं है, जिसके कारण इस गांव के लिए आया वाईफाई बच्चों के क्लास रूम में लगा दिया गया है। वहीं, समाजसेवी बल्ल्भाचार्य ने कहा, गांव के कई नाम होने की वजह से यह नेट पर सर्च करने पर नहीं मिलता है। विकास के लिए बजट भी नहीं आवंटि‍त हो पाता है। इस समस्या से गांव कई पीढ़ियों से जूझ रहा है।

क्या है फैसिलि‍टी-

एरिया– 3100 हेक्टेयर
पॉपुलेशन– 2100
फैसिलिटी- एक प्राइमरी स्कूल, एक पूर्व माध्यमिक स्कूल, स्वच्छ भारत मिशन के तहत 250 टॉयलेट, एक निर्माणाधीन ठोस वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर, सड़क के ट्रांसफार्मर से पावर सप्लाई।

गांव में इन चीजों की है कमी-

पंचायत भवन, बैंक, एटीएम, डाकघर, आंगनवाड़ी केंद्र, गांव में फोन लाइन तक नहीं है।

क्या है बड़ी समस्या

गांव की सबसे बड़ी समस्या उसका नाम है। कोई भी विकास योजना नहीं शुरू हो पा रही है। सीवर नाली का प्रारूप नहीं बन पा रहा है। वेरिफिकेशन में दिक्कतें आती हैं।

क्या कहते हैं अधि‍कारी-

एडीओ (असिस्टेंड डेवलपमेंट ऑफि‍सर) मयंक गौड़ ने बताया, ग्राम पंचायत के रजिस्टर में ढाका नाम दर्ज है। वैसे बहुत लोग ढकवा भी बोलते हैं। नाम परिवर्तन के लिए कभी किसी ने लिखित तौर पर कम्प्लेन नहीं दिया है।

रिपोर्ट- रविंद्रनाथ सिंह 

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