जब स्वामी विवेकानंद जी ने अमरीका से अपने गुरुभाइयों पत्र लिखा २५ सितम्बर १८९४…

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जब स्वामी विवेकानंद जी ने अमरीका से अपने गुरुभाइयों पत्र लिखा २५ सितम्बर १८९४…
इस पत्र के माध्यम से आपको अमरीका की उस समय की तत्कालीन जीवन शैली और स्थिति का आभास हो सकता हैं ………आगे स्वामी जी के शब्दों में ……

“इस देश में सब ग्रीष्म काल में समुद्र के किनारे चले जाते हैं, मैं भी गया था I यहाँ वालों को नाव खेने और “याट” चलाने का रोग हैं I याट एक प्रकार का हल्का जहाज होता हैं और यहाँ लड़के, बूढ़े, तथा जिस किसी के पास भी धन हैं, उसी के पास हैंI उसी में पाल लगाकर वे लोग प्रतिदिन समुद्र में डाल देते हैं, और खाने पीने और नाचने के लिए ही घर लौटते हैं और गाना बजाना तो रात दिन लगा ही रहता हैं, पियानो के मारे घर में टिकना मुश्किल हो जाता हैं I

swami vivekanand
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हां, तुम जिन जी.डब्ल्यू. हेल. के पते पर चिट्ठियां भेजते हो, उनकी भी कुछ बातें लिखता हूँ, वे वृद्ध हैं और उनकी वृद्धा पत्नी हैं, तो कन्यायें हैं, दो भतीजियाँ हैं और एक लड़का हैं I लड़का नौकरी करता हैं, इसलिए उसे दूसरी जगह रहना पड़ता हैंI लड़कियां घर पर रहती हैं, इस देश में लड़की का रिश्ता-ही-रिश्ता हैं I लड़के का विवाह होते ही वह और हो जाता हैं, कन्या के पति को अपनी स्त्री से मिलने के लिए प्रायः उसके बाप के घर जाना पड़ता हैं I यहाँ वाले कहते हैं :

‘Son is son till he gets a wife
‘ The daughter is daughter all her life.’

चारों कन्याएँ युवती हैं और अविवाहित हैं I विवाह होना इस देश में महाकठिन कार्य हैं I पहले तो मन के लायक वर हो, दूसरे घर हो ! यहाँ के लड़के यारी में तो बड़े पक्के हैं, परन्तु पकड़ में आने के वक्त नौ दो ग्यारह ! लड़कियां नाच-कूदकर किसी को फंसाने की कोशिश करती हैं, लड़के जाल में पड़ना नहीं चाहते I आखिर इस तरह से लव हो जाता हैं, तब शादी हो जाती हैं I यह हुई साधारण बात, परन्तु हेल की कन्यायें रूपवती हैं, बड़े आदमी की कन्यायें हैं, विश्वविद्यालय की छात्र्यायें हैं, नाचने, गाने, पियानों बजाने में अद्वतीय हैं I कितने ही लड़के चक्कर मारते हैं, लेकिन उनकी नजर में नहीं चढ़ते I जान पड़ता हैं वे विवाह नहीं करेंगी, जिस पर अब मेरे साथ रहने के कारण महावैराग्य सवार हो गया हैं I वे इस समय ब्रम्हा चिंतन में लगी रहती हैं I
हेल की कन्याओं के नाम मेरी और हेरियट हैं और एफ. हेरियट और ईशाभेल हेल भतीजियों के I दोनों कन्याओं के बाल सुनहले और भतीजियों के काले I ये जूते से सीने से लेकर चंडी पाठ तक सब जानती हैं Iभतीजियों के पास उतना धन नहीं है, उन्होंने एक किंडर गार्टन स्कूल खोला हैं, लेकिन कन्याएँ कुछ भी नहीं कमाती I कोई किसी के भरोसे नहीं रहता I करोड़पतियों के पुत्र भी रोजगार करते हैं, विवाह के बाद अलग किराए के मकान में रहते हैं I कन्यायें मुझे दादा जी कहती हैं, मैं उनकी माँ को माँ कहता हूँ I मेरा सब समान उन्ही के घर पर हैं I मैं कही भी जाऊं, वे उसकी देखभाल करती हैं I यहाँ के सब लड़के बचपन से ही रोजगार में लग जाते हैं और लड़कियां विश्वविद्यालय में पढ़ती लिखती हैं, इसीलिए यहाँ सभाओं में ९०फीसदी स्त्रियाँ रहती हैं, उनके आगे यहाँ लड़कों की दाल नहीं गलती I”

दोस्तों सबसे बड़ी बात यह है कि इतने पुराने समय में आप देखो अमेरिका का सजीव चित्रण हमारे देश के एक सन्यासी ने किया हैं …..
इस पत्र के आगे का भाग आगे के अंश में ….

 

Source of the letter ….योद्धा सन्यासी विवेकानंद
 

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