एक शोध अध्ययन के अनुसार आयुर्वेद प्रकृति- ‘तीन दोष’ जीनोमिक संरचनाओं के साथ संबद्ध हैं |

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एक जीनोम व्यापक अध्ययन से पता चला है कि आयुर्वेदिक प्रकृति वर्गीकरणों का जीनोम विविधता के साथ कुछ सह संबंध है। इस विषय पर एक अध्ययन सेंट्रल फॉर सैलुलर एंड मोलिकुलर बाइलॉजी (सीसीएमबी) हैदराबाद द्वारा अन्य राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से किया गया है। सीसीएमबी वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद का एक प्रमुख अनुसंधान संगठन है। सीसीएमबी में डॉक्टर थंगराज के नेतृत्व में एक अनुसंधान दल ने यह कार्यक्रम शुरू किया। अच्छी तरह प्रशिक्षित आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने लगभग 3400 लोगों की जांच की एवं उन्हीं व्यक्तियों की सी-डीएसी बेंगलूरू द्वारा विकसित आयुसॉफ्ट नामक सॉफ्टवेयर द्वारा जांच की गई।

आयुर्वेदिक चिकित्सकों का विश्वास है कि मानव शरीर में तीन दोष या जैविक ऊर्जा/मनोवृत्तियां पाई जाती हैं। प्राचीन भारतीयों का यह विश्वास था कि हम जो भी चीज देखते हैं वह पंचतत्वों- अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से बनी होती है। वात अंतरिक्ष और वायु तत्वों से संबंधित है, पित्त अग्नि और जल से संबंधित है और कफ जल और पृथ्वी तत्वों से संबंधित है। प्रत्येक व्यक्ति में इन तीनों दोषों के विभिन्न स्तर पाये जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को वर्गीकृत किया जा सकता है कि उसमें किस दोष की अधिकता मौजूद है। वे व्यक्ति जिनकी प्रकृति आयुर्वेदिक चिकित्सकों और आयुसॉफ्ट द्वारा किए गए मूल्यांकन के बीच सहमति में थी उनके रक्त के नमूने संबंधित प्रयोगशालाओं द्वारा एकत्रित किए गए। डीएनए का विलगन और जीनोमिक अध्ययन एफीमैट्रिक्स से 6.0 एनएनपी चिप का उपयोग करते हुए सीसीएमबी में अध्ययन किया गया। इस चिप ने परीक्षण नमूनों के जीनोम में एकल अंतर दर्शाए। जब आंकड़ों को प्लोटिड किया गया तो वे दिलचस्प रूप से तीन समूहों में बंट गए जो प्राचीन वर्गीकरण के लिए आणविक आधार को स्थापित करते हैं।

क्या प्ररूपी वर्गीकरण का कोई आणविक आधार है इसके बारे में कुछ समय तक बहस होती रही। कुछ समूहों ने इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया और जब उन्होंने एक या दो विशिष्ट जीनों को देखा तो उन्होंने इनमें कुछ सह संबंध पाया। तथापि जीनोमिक विविधताओं के सहयोग की प्रकृति की वर्गीकरण के साथ कमी देखी गई।

यह जीनोमिक विविधता के साथ आयुर्वेदिक प्रकृति वर्गीकरण के बीच इस तरह का सह संबंध स्थापित करने के लिए यह पहला जीनोम व्यापक अध्ययन है। इन एकल न्यूक्लोटाइड बहुरूपताओं के विश्लेषण से पता चला है कि लगभग 52 जीन व्यक्ति के दोषों या प्रकृति को निर्दिष्ट करने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। डॉ. थंगराज और उसेक दल ने इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए यह पता चलाने का प्रयास किया कि अगर यह नमूने बेतरतीब रूप से जानकारी और उनकी प्रकृति के बिना एकत्र किए जाते हैं तो क्या वे भी 52 एसएनपी पर आधारित विश्लेषण के बाद तीन समूहों में बंट जाते हैं। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

सीसीएमबी के निदेशक डॉ. मोहन राव ने कहा कि यह अध्ययन जीनोम के आधार पर किसी व्यक्ति की प्रकृति की पहचान करने में मदद करेगा। यह आधुनिक विज्ञान के साथ हमारे प्राचीन ज्ञान को जोड़ने वाली एक बड़ी सफलता है। उन्होंने कहा कि इस कार्य से इसी तरह के अधिक अध्ययन करने की प्रेरणा मिलेगी। इन अध्ययनों को अंततः आधुनिक चिकित्सा के साथ साथ आयुर्वेद की स्थापना के लिए नेतृत्व प्रदान किया जाना चाहिए।

Source – PIB

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