दुनिया सारी बावरी पाथर पूजै जाय, घर कै चकिया कोऊ न पूजै जाका पीसा खाय

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बीघापुर/उन्नाव(ब्यूरों)- सैकड़ों वर्ष पहले कबीर दास जी के द्वारा कही गई ये पंक्तिया उस समय की तरफ भी इशारा करती थी की वह सम्मान चकिया को नही मिला जिसकी वह हकदार थी|

बुजुर्ग बताते है की चकिया लगभग हर छोटे बड़े तबके के घर में थी घर की महिलाए भोर पहर उठ कर इसी चकिया में गेहूं आदि अनाज पीस कर आँटा बेसन तैयार करती थी सबके खाने के लिए आँटा भी तैयार हो जाता था और महिलाओ की शारीरिक कसरत भी हो जाती थी घर में पीसे आटे की गुणवत्ता भी अधिक रहती थी तभी तो सभी हष्ट पुष्ट रहते थे आज की आधुनिक नारी भले ही उन औरतों को अनपढ़ गवाँर कहे पर आज भी तुलना की जाय तो इंच मात्र भी बराबरी नही कर सकती आज शिक्षा पर भले ही पकड़ बना ली हो हर ऊचे ओहदे पर नारी नजर आती हो पर राम, कृष्ण, शिवा जी, आल्हा, ऊदल, आदि वीर पुरुषो की उतपत्ति भी उन्ही औरतों की देन है कल्पना चावला सुनीता विलियम्स आदि बनना आसान नही है तो कौशल्या, अहिल्या, जीजाबाई आदि बनना भी कोई खेल नही है|

वर्तमान और पूर्व की महिलाओ की तुलना कभी-कभी बुजुर्ग करते है | ख़ैर सभी ने अपने-अपने समय में महारथ हासिल किया हम बात कर रहे थे चकिया की पूर्व में भी जब सभी उस पर आसरित थे तब भी वह पूज्य नही थी और आज तो उस यन्त्र का नामो निसान मिटता जा रहा है|

आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में किसके पास समय है जो इन यंत्रो में माथा पच्ची करे आज के बच्चे शायद पहचान भी नही पायेगे की चकिया भी कोई हमारे पूर्वजो का अति आवश्यक यन्त्र था| गाँव के मन्दिरो में अब यह यन्त्र टूटे हुए पड़े दिखाई देते है जहाँ कभी-कभी लोगो को पानी और फूल चढ़ाते देखा जा सकता है इन दृश्यों को देख कर लगता है की जब जिसको जो सम्मान मिलना चाहिए शायद तब उसको वह सम्मान नही मिलता है|
रिपोर्ट- मनोज सिंह

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