आज अगर इंदिरा जी होती देश की प्रधानमंत्री तो हो चुके होते पाकिस्तान के टुकड़े

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आपकी बात – पाकिस्तान लगातार अपनी नापाक हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है, आये दिन पाकिस्तान अपने सबसे ख़ास दोस्त चीन के साथ मिलकर भारत के खिलाफ हर स्तर पर परेशानियों का सबब बना हुआ है | कभी सामने से तो कभी पीठ पीछे से पाकिस्तान भारत को नुकसान पहुँचाने का कोई भी मौका छोड़ नहीं रहा है | आये दिन जिस तरह से हमारे सुरक्षा बलों पर पाकिस्तान के आतंकी हमला बोल रहे है उससे एक बात स्पष्ट हो चुकी है कि पाक कभी भारत का सगा नहीं हो सकता है और न ही पाकिस्तान कभी भारत को बढ़ता हुआ देख सकता है | ऐसे में भारत एक पूर्व प्रधानमंत्री की बड़ी याद आती है और यही मन करता है कि आज यदि भारत की कमान इंदिरा के हाथ में होती तो शायद पाकिस्तान के कुछ और टुकड़े हो चुके होते या फिर पाकिस्तान नस्तेनाबूद हो चुका था |

दरअसल आपको बता दें कि यह मात्र कोई कोरी कल्पना नहीं है बल्कि इतिहास में मौजूद तथ्यों को आधार बनाकर कहा जा रहा है | इतिहास गवाह है कि इंदिरा गांधी के ज़माने में जब भारत इतनी मजबूत स्थिति में नहीं था तब भी इंदिरा गांधी ने भारत की सुरक्षा के साथ कभी समझौता नहीं किया और न ही उन्होंने कभी भारत की अस्मिता की रक्षा के लिए दूसरों पर ही डिपेंड रही | जरूरत पड़ने पर ऊन्होने आगे बढ़कर दुस्श्मनों से लोहा लिया और पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँट दिया था | इंदिरा की आक्रमकता उनके काम में हमेशा दिखाई पड़ती थी |

रणनीति बनाने में बेहद माहिर थी इंदिरा गाँधी-
इंदिरा गांधी के बारे में यदि बात कर रहे है तो एक बात उनके काम में हमेशा से दिखती थी कि वह रणनीति बनाने में सबसे माहिर प्रधानमंत्री थी | उन्होंने कभी भी दुश्मन के या फिर विरोधियों के दबाव के सामने घुटने नहीं टेके | एक वक्त था जब पूरी दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क पाकिस्तान के साथ खड़े थे उस समय अकेले ही उन्होंने पाकिस्तान को मज़ा चखाया था |

सुरक्षा बलों को खुली छूट दे रखी थी –
इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने सुरक्षा बलों को हद से ज्यादा छूट दे रखी थी | उनके ज़माने में स्थिति के अनुसार सेना को कार्यवाही करने की पूरी आज़ादी थी | देश की सभी आर्म्ड फोर्सेज के लक्ष्य हमेशा तय होते थे और इतना ही नहीं सेना के तीनों अंगों में एक बेहतर समन्वय की भावना होती थी | उनके समय में स्ट्रेटजिक, ऑपरेशनल और टैक्टिकल लेवल पर प्लानिंग होती थी | उन्होंने कभी भी संकट के समय में अंतर्राष्ट्रीय मदद के बगैर ही राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कोई समझौता नहीं किया और न ही उन्होंने कभी किसी का इंतज़ार ही किया, न ही वह अंतर्राष्ट्रीय दबाव में ही आई |

सख्त फैसले लेने में कभी नहीं हिचकिचाई-
इंदिरा गांधी के बारे में यदि कभी भी चर्चा की जाए तो एक पहलू पर बिना नज़र डाले उनके बारे में बात कभी पूरी हो ही नहीं सकती है कि इंदिरा कभी भी सख्त फैसला लेने हिचकिचाती नहीं थी | उनके कामों में राष्ट्रहित हमेशा सर्वोपरि था | बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा का पहला कार्यकाल 1966 से 1971 तक रहा | इसी दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच एक भीषण युद्ध हुआ | इस युद्ध में भारत ने न केवल पाकिस्तान को बुरी तरह से पराजित ही किया अपितु द्वतीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी संख्या में सैनिक सम्पर्पण भी इसी युद्ध के दौरान हुआ और जो पाकिस्तान पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा हुआ था और दोनों ही छोरो से भारत को घेरने की तैयारी कर रहा था उसे काटकर एक अलग देश बना दिया जिसे आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है |

पाकिस्तान की सभी उड़ानों को कर दिया था बैन –
30 जनवरी, 1971 को जब पाकिस्तान की सरपरस्ती में पलने वाले आतंकियों ने इंडियन एयरलाइन्स के विमान को हाइजैक करके पाकिस्तान के लाहौर हवाई अड्डे पर ले गए थे और उसे तहस नहस कर दिया था उसके बाद इंदिरा गांधी ही वह प्रधानमंत्री थी जिन्होंने बेहद बोल्ड निर्णय लेते हुए भारत के ऊपर से होकर जाने वाली सभी पाकिस्तानी जहाजों की उड़ान पर प्रतिबन्ध लगा दिया था | इसका सबसे बड़ा फायदा तब हुआ जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा तो पाकिस्तान आज के बांग्लादेश में युद्ध कर रही अपनी सेना को कोई मदद नहीं दे सका |

पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने वाली थी इंदिरा गांधी –
इंदिरा गांधी ने जब वर्ष 1980 में सत्ता में पुनः वापसी की थी उस समय उन्होंने पाकिस्तान के सभी परमाणु ठिकानों पर हमला बोलकर उन्हें नष्ट कर डालने की योजना बना डाली थी | इस बात का खुलासा अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने बाद में किया था | इंदिरा गांधी कभी यह नहीं चाहती थी कि पाकिस्तान परमाणु छमता वाला देश बन सके | इंदिरा की अगुवाई वाली भारत सरकार का यह मानना था कि पाकिस्तान परमाणु हथियार बना लेने के बेहद करीब है | यही कारण था कि वह पाकिस्तान के सभी ख़ुफ़िया ठिकानों को नष्ट कर देना चाहती थी |

सेना पर था अटूट विश्वास, वापस कर दिया था सेना प्रमुख का इस्तीफा-
इंदिरा को अपनी सेना और कमांडरों पर बहुत अधिक भरोषा था | यही वजह थी कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल बन गया था और इंदिरा ने तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष सैम मानिक शॉ से पाकिस्तान पर हमला करने के लिए कहा था और सैम ने ऐसा करने से मना कर दिया था साथ ही सैम ने अपने स्तीफे की भी पेशकश कर दी थी तब इंदिरा ने उनके स्तीफे को बेहद विनम्रता के साथ वापस भेज दिया था |

इसके बाद सैम मानिकशॉ ने कहा था कि, ‘मैं एक सैनिक और लड़ना मेरा धर्म है, लेकिन मैं युद्ध हमेशा जीतने के लिए लड़ने में विश्वास रखता हूँ |’ बाद में सैम की बातें अक्षरशः सिद्ध साबित हुई और मात्र 14 दिनों के भीतर ही भारत ने पाकिस्तान को न केवल बुरी तरह से पराजित ही किया अपितु दुनिया के नक्से पर एक नए देश का उदय हुआ और पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को भारतीय सेना के सामने हथियार डालने पड़े |

रिपोर्ट- धर्मेन्द्र सिंह

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