शहीद होने के 18 साल बाद सेना को मिला शहीद का शव, पूरे सम्मान के साथ उसके गाँव पहुंचाया गया

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मुझे गर्व हैं यह कहने में की मैं भारत का वासी हूँ, यह मात्र कुछ शब्दों का कोई पुलिंदा नहीं है यह एक आवाज है जो ह्रदय से आती है | घटना अगस्त 2014 की है जब केंद्र की सत्ता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संभाली थी तभी एक दिन खबर आई कि वर्ष 1996 में दुनिया के सबसे ऊँचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन में भारतीय सीमा की रक्षा करते हुए यूपी के मैनपुरी का एक बेटा शहीद हो गया था | लेकिन सेना को शहीद का शरीर बहुत ढूढने के बाद भी नहीं मिला था उस शहीद को ऐसा लगा कि भारत माता ने अपनी गोद में समा लिया था |

लेकिन एक दिन अचानक से जब सेना के जवान अगस्त 2014 में सियाचिन में अपनी पोस्ट पर पेट्रोलिंग कर रहे थे तभी उन्हें अचानक से वर्दीधारी जवान का शरीर बर्फ में दिख गया | उसके बाद तुरंत ही भारतीय सेना के जवानों ने शव को बाहर निकाला और बाद में जब सेना के रिकार्ड देखा गया तो पता चला कि वह सेना के 18 साल पहले शहीद हुए यूपी के मैंनपुरी के सिपाही है |

शहीद गयाप्रसाद ने वर्ष 1982 में भारतीय सेना को ज्वाइन किया था और उन्हें वर्ष 1996 में सियाचिन पर भारतीय सीमा की चौकसी करने के लिए भेजा गया था | वही सीमा की रक्षा करते हुए वे शहीद हो गए थे | 18 साल से गयाप्रसाद के बूढ़े माँ-बाप को बस एक ही बात का मलाल था कि उन्हें अपने बेटे के शरीर के आखिरी दर्शन करने को भी नहीं मिले | लेकिन कहते है न कि ईश्वर कभी भी एक माँ की पुकार को नहीं ठुकराता और न ही एक सपूत कभी अपनी माँ की आवाज से मुंह फेरता है | वही हुआ गया प्रसाद के साथ, गयाप्रसाद की तो दोनों ही माताएं उन्हें शायद उतना ही प्रेम करती थी कि वे दोनों ही उन्हें अपने साथ ही रखना चाहती थी | तभी तो पहले भारत माता ने भी अपने ऊपर जान न्यौछावर करने वाले अपने सपूत को अपनी गोद में 18 सालों तक छुपा के रखा था | लेकिन शायद बाद उनकी जन्म देने वाली बूढी माँ की ममता ने बाद में अपनी अंतिम साँसों की दुहाई देकर अपने उस बेटे को अपने पास बुला ही लिया |

गर्व है मुझे हिन्दुस्तानी होने पर –
आज मुझे बेहद गर्व मह्शूश हो रहा है कि मै एक हिन्दुस्तानी हूँ | आज भी हमारा देश सभी मानवीय सोच और धारणाओं से हमेशा ऊपर उठकर सोचता है | हमारे देश के कण-कण में आज मानवता जीवित है | हमारे देश की सीमा की रक्षा करते हुए आज से 18 साल पहले शहीद हुए उस जवान जैसे ही हमारी सेना के जवानों को मिला तो उन्होंने वह कौन है और कहाँ के यह पता लगाने के लिए आकाश और पातळ सब एक कर दिए और पता लगाकर ही मानें | वही दूसरी और हमारे आस-पास ऐसे भी देश है जो युद्ध भूमि में शहीद हुए अपने सैनिकों को पहचानने से भी मना कर देते है |

जब शहीद गयाप्रसाद का शव उनके पैत्रक गाँव पहुंचा – पूरा विवरण –
यूपी में मैनपुरी के गांव कुड़रिया में बुधवार की रात अन्य रातों से बिल्कुल जुदा थी। लोगों की आंखों में न नींद थी और न दिल में शांति। नींद आती भी तो कैसे 18 साल बाद गांव का चहेता शहीद गयाप्रसाद का शव जो आ रहा था।

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हालांकि आमतौर पर दिन छुपते ही सड़कों पर गुप अंधेरा और सन्नाटा हो जाता था। गांव में बिजली न होने के कारण अधिकांश लोग चारपाई पकड़ सोने चले जाते थे वहीं बुधवार रात को गांव में जेनरेटरों की धड़धड़ाहट गूंज रही थी। सभी को एक-एक पल वर्षों के समान लग रहा था। बुधवार रात 11:05 बजे 29 पैरा राजपूत रेजीमेंट आगरा के लेफ्टिनेंट संदीप त्यागी के नेतृत्व में शहीद गया प्रसाद का शव कुड़रिया लाया गया।

शहीद गया प्रसाद के बुजुर्ग पिता गजाधर सिंह घर के बाहर लोगों से घिर बैठे थे। उन्होंने बताया कि बेटे ने 1982 में फौज में नौकरी शुरू की थी और नवंबर 1996 में सियाचिन में पोस्टिंग हुई थी। घर में बैठे कुछ रिश्तेदार युवक फोन पर शहीद के बेटे सतीश से फोन पर शव कहां तक पहुंचा आदि जानकारी लेकर पास बैठे लोगों को बता रहे थे।

रात लगभग आठ बजे जैसे ही शव के फीरोजाबाद पार करने की सूचना ग्रामीणों को मिली। उनकी धड़कनें और बढ़ गईं। रात नौ बजे सीओ भोगांव और एसडीएम भोगांव गांव में पहुंचे और थोड़ी देर रुकने के बाद दूसरे दिन आने की बात कहकर गांव से चले आए। रात 11:05 बजे गांव में शहीद का शव पहुंच गया।

gaya prasad2गांव में शव पहुंचने पर परिजनों की आंखें नम हो गईं। शहीद गया प्रसाद की पत्नी रोने लगीं। 1984 में पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर में कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना को इस क्षेत्र से पीछे धकेलने के लिए वापस क्षेत्र पर भारतीय कब्जा करने के लिए आपरेशन मेघदूत चलाया था। इसी दौरान 1996 में गश्त पर निकले सैनिक गयाप्रसाद ग्लेशियर की दरार में समा गए थे | तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल वेद मलिक ने 16 नवंबर 1999 को शहीद घोषित किया और शहीद पत्र व सभी सुविधाएं सैनिक के परिवार को देने की घोषणा की थी।

लगभग एक सप्ताह पहले सियाचिन में सेना के जवानों की एक टुकड़ी रुटीन गश्त पर थी। इस दौरान ग्लेशियर पर बर्फ के बाहर एक हाथ निकला दिखाई दिया। सेना के जवानों ने शव को बाहर निकाला तो उसकी पहचान गयाप्रसाद के रूप में हुई। 18 साल पहले मिला जख्म वक्त के साथ धीरे धीरे भर गया था। गया प्रसाद की पत्नी रामादेवी ने उनकी जिम्मेदारी को परिवारीजनों के सहयोग निभाया और बेटे बेटियों की शादी की। अब जो हुआ उसकी तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी।

एसी एंबुलेंस से दिल्ली से शव को लेकर गांव आ रहे डाक्टर आदेश कुमार ने बताया कि चेहरे की त्वचा थोड़ी खराब हो गई है लेकिन पूरा शरीर सही सलामत है। बर्फ में दबा गयाप्रसाद का शव 18 साल बाद भी सुरक्षित रहा। 90 वर्षीय पिता गजाधर सिंह और रामादेवी को हमेशा यही मलाल रहता था कि अंतिम दर्शन तक वह नहीं कर पाए। गजाधर और अन्य परिवारीजनों का कहना है कि अब शास्त्रों के अनुसार अंत्येष्टि और अन्य क्र्तियाएं पूरी हो जाएगी। मान्यता है, इनके बिना आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती।

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