आखिर यह कैसा विकास है ? जहाँ एक वृद्ध विधवा माँ की आखिरी साँस का इंतज़ार करने पर विवश है एक बेटी

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प्रतापगढ़ (ब्यूरो)- यह कैसा विकास है ? आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास में जहाँ हम एक तरफ मंगल गृह पर पहुँच बना रहे है, दुनिया के सबसे विकसित और श्रेष्ठ देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का दावा कर रहे है वही दूसरी तरफ देश की एक वृद्ध महिला आज भी दो जून की रोटी और इस भीषण सर्दी से बचने के लिए एक छत तक से भी वंचित है | आखिर यह कैसा विकास है ?

दरअसल आपको बता दें कि उत्तरप्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है | सभी पार्टियाँ अपने-अपने सेनापतियों के साथ मैदान में उतर रही है हालाँकि सत्ता के शीर्ष तक कौन पहुंचेगा यह अभी दूर की बात है लेकिन सभी विकास के बड़े-बड़े दावे कर रहे है | अपनी-अपनी सरकारों के द्वारा किये गए कार्यों को बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर जनता के सामने पेश कर रहे है | लेकिन जब हम इन दावों की जमीनी हकीकत की पड़ताल करते है तो पता चलता है कि इन दावों में और जमीनी सच्चाई में ठीक उतना ही अंतर है जितना कि मंगल पर जीवन के, अर्थात व्यक्ति बस जिन्दा है लेकिन कब तक यह कुछ कहा नहीं जा सकता, मूल भूत आवश्यकताओं के लिए हर दिन आम आदमी अनुसंधान करने पर विवश है |

आज हम आपको बता रहे है जनपद प्रतापगढ़ के मांधाता विकासखंड के बैशपुर गांव की एक वृद्धा की कहानी जिसकी आँखों को न जाने कितनी सरकारों ने और उनके प्रतिनिधियों ने, ग्राम प्रधानों ने, सरकारी अधिकारियों ने, सुनहरे सपने दिखायें, उम्र के इस पड़ाव तक पहुँचने में न जाने कितनों ने उन्हें छला, विश्वास दिलाया कि यदि इस बार हम जीते तो आपके हर कष्ट को हर लेंगे और हर बार इस दिल ने भी सभी कड़वे अनुभवों को भुलाकर इनपर भरोषा किया लेकिन उनका सौभाग्य और इनका दुर्भाग्य तो जरा देखिये हर बार वह जीते तो लेकिन यह फिर से और एक बार फिर से छली गयीं|

ये आँखें जो कभी विकास के सपनें देखा करती थी आज वह सभी सपने इनकी आँखों में ही दम तोड़ चुके है | आज तो इन्हें बस दो जून की रोटी मिल जाये और भीषण सर्दी से बचने के लिए बस कही से एक छत का इंतजाम हो जाय यही इनके लिए बहुत है | आपको बता दें कि प्रतापगढ़ जिले के मान्धाता विकासखंड के बैशपुर गाँव में रहने वाली दुर्गादेवी मालिनी की हालत इतनी नाजुक है कि वह बीमार है लेकिन उनके पास इलाज़ के लिए पैसे नहीं है, उन्हें सर्दी लगती है लेकिन रहने के लिए छत और तन ढकने के लिए गर्म कपडे नहीं है |

उनके अपने पास परिवार के नाम पर एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है, उसकी भी हालत कुछ ऐसी नहीं है कि वह अपनी माँ के लिए कुछ कर सकें, अब बेटी को भी अब बस इंतज़ार है तो उस आखिरी सांस का जिसके बाद उसकी माँ पञ्चतत्त्व में विलीन हो जायेगी, आखिर वह इस विकसित भारत में और कर भी क्या सकती है ?

हम एक बार फिर से कहते है कि, जरा सोचिये कि आखिर यह कैसा विकास है ? जहाँ एक तरफ हम मंगल पर तो जीवन तलाश रहे है लेकिन जीवन से मंगल गायब है ?
रिपोर्ट- अवनीश मिश्र
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