भारत की दखलंदाजी और बांग्लादेश की आजादी, पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण और याहिया के आतंक के अंत की पूरी कहानी –

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भारत की स्वतंत्रता और जिन्ना की मूर्खता

15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद हो चुका था, आज के दिन आज़ाद होने वाला ” भारत ” वह भारत था, जिसकी भुजायें पूर्व में बंगाल की खाड़ी से भी आगे बर्मा की सीमाओं को स्पर्श करती थी तो पश्चिम में अरब के लिए द्वार खोलती थी और उत्तर में हिमालय की चोटी इस देश का सर तो इसके पैर दक्षिण में हिन्द महासागर में श्रीलंका की समुद्री सीमा  तक फैले हुए थे I

फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण करने से पहले
फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण करने से पहले

लेकिन जब अंग्रेज जाने लगे तो उन्हें एक अति महत्त्वाकांक्षी और अत्यधिक मूर्ख व्यक्ति का सहयोग प्राप्त हो गया व सानिध्य प्राप्त हो गया इस इकलौते मूर्ख व्यक्ति का नाम था “मोहम्मद अली जिन्ना” था I जिसे आजकल पाकिस्तान में “कायदे आज़म” भी कहा जाता है I उस एक व्यक्ति की मूर्खता की वजह से पूरी दुनिया में वर्चस्स्व रखने वाला देश भारत तीन टुकड़ों में विभाजित हुआ जिसमें से दो बने पाकिस्तान और एक बना हिंदुस्तान I

दो पाकिस्तान बनाने के पीछे जिन्ना की चाल

मोहम्मद अली जिन्ना उर्फ़ पाकिस्तान के तथाकथित कायदे आज़म का दिमाग हमेशा से ही जातिवाद और कट्टरता से भरा हुआ था अगर हम उनके चरित्र की खामियां गिनवाना शुरू कर दें तो शायद कुरान में जितने पन्ने होते है वह भी कम पड़ जायेंगे I ऐसा चरित्र था कायदे आज़म जिन्ना का I

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पंडित जवाहरलाल नेहरु के साथ मोहम्मद अली जिन्ना

मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत को पूर्वी और पश्चिमी दोनों छोरों से घेरने के मकसद से दोनों ही छोरों पर पाकिस्तान की मांग की थी, क्योंकि जिन्ना को भारत का भूगोल बहुत अच्छी तरह से पता था और उसे पता था कि भारत को किसी भी तरफ से छोड़ना उचित नहीं हैं और अगर पाकिस्तान केवल भारत के एक ही छोर यानि की पश्चिमी छोर पर रहेगा तो भारत के ऊपर दबाव नहीं बनाया जा सकता है I यही कारण था की जिन्ना की कूटनीति ने भारत को दोनों छोरों पर घेरने का प्रयास किया I वैसे तो जिन्ना दक्षिणी छोर पर स्थित हैदराबाद को भी पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहते थे लेकिन सरदार वल्लभ भाई पटेल के होते यह संभव न हो सका और जिन्ना को हैदरबाद का सपना देखते-देखते ही मरना पड़ा I

जिन्ना ने जिस वक्त भारत के दोनों छोरों पर पाकिस्तान की कल्पना की थी उसे लगा था कि ऐसा करके वह धीरे-धीरे भारत को  ख़त्म कर देगा, कमजोर कर देगा लेकिन उसे क्या पता था कि एक दिन माँ भारती की संताने उसके उस सपने यानि पूर्वी पाकिस्तान को ही ख़त्म कर देंगी I 1971 का युद्ध जिन्ना की उसी चालाकी का परिणाम था जिसने दुश्मन देना चाहा था लेकिन न चाहते हुए भारत को एक अच्छा दोस्त दे गया I

जिन्ना ने जिस पाकिस्तान की कल्पना भारत का प्रतिद्वंदी बनाने के लिए किया था, जिन्ना की आँखों के बंद होते या फिर यूँ कहे तो उनके रहते ही उनके उसी पाकिस्तान में ही खींचातान शुरू हो चुकी थी I पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) के लोग अपने लिए समान न्यायोचित व्यवस्था की मांग कर रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि पश्चिमी पाकिस्तान के नौकरशाह उनकी अनदेखी और अवहेलना कर रहे है I

जिन्ना के सपने का खात्मा और बांग्लादेश का उदय

इसी क्रम में आज़ादी के 23 सालों बाद जब 1970 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए तो पूर्वी पाकिस्तान के नेता शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी ने केवल और केवल पूर्वी पाकिस्तान में ही चुनाव लड़ कर 162 सीटों में से 160 सीटें हासिल कर ली थी I और इस तरह से शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी को पश्चिमी पाकिस्तान में 1 भी सीट पर बिना चुनाव लडें ही पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली में पूर्ण बहुमत मिल गया था I

लेकिन उस समय के पाकिस्तानी सैन्य तानाशाह जनरल याहिया खाँ ने सत्ता के हस्तांतरण को छोड़ 25 मार्च 1971 को बर्बरता पूर्वक सैनिकों के द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को उनके आन्दोलन और उनकी मांगों को कुचलने का आदेश दे दिया I

पाकिस्तानी सेना के द्वारा बांग्लादेश में बर्बरता की एक तश्वीर
पाकिस्तानी सेना के द्वारा बांग्लादेश में बर्बरता की एक तश्वीर

शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर पूर्वी पाकिस्तान की जेल में उनके साथियों के साथ ठूस दिया गया और वहां की आम जनता जो कि शेख मुजीबुर्रहमान की समर्थक थी उनके ऊपर सैनिकों ने बर्बरता की सभी सीमाओं को पार कर दिया I

भारत का हस्तक्षेप और पाकिस्तान का विभाजन

ऐसे पूर्वीपाकिस्तान के वह निर्दोष नागरिक शरण लेने के लिए भारत की तरफ भागने लगे पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) से लगे हुए भारत को जो राज्य है जिनमें से पश्चिम बंगाल, असम आदि में रोजाना लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत में आने लगे I इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों को आता देख केंद्र में बैठी इंदिरा गांधी की सरकार को चिंता हुई और इस पूरे घटना क्रम से निपटने के लिए उन्होंने दिल्ली में केबिनट की आपात मीटिंग बुलावायी जिसमें उन्होंने तब के सेनाध्यक्ष फील्डमार्शल सैम मानिकशॉ को भी बुला लिया था I

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस पूरे प्रकरण पर बात करने के पश्चात सैम मानिक शॉ से कहा कि वह तुरंत अपनी सेना को बांग्लादेश के अन्दर जाने का आदेश दें और इस स्थित से निपटने के लिए सभी जरूरी कदम उठायें I यह सुनकर जनरल सैम मानिक शॉ ने कहा कि, “बांग्लादेश में सेना ले जाने का मतलब समझती हैं न आप, यह युद्ध होगा I”

श्री मती गांधी ने जवाब दिया कोई बात नहीं, अगर युद्ध होगा तो होने दो ! हम युद्ध करेंगे, आप सेना को भेजने का आदेश दो I जनरल सैम ने कहा ऐसा नहीं हो सकता, की आपने कहा और बस सेना चल देगी I मुझे इसके लिए समय चाहिए मुझे सभी जरूरी तैयारियां करनी है I लेकिन इस पर श्री मती गांधी काफी नाराज हुई तो सैम ने कहा कि अगर आपको युद्ध जीतना है तो आप मुझे समय दीजिये कब और कैसे युद्ध करना है यह हम तय करेंगे I और अगर फिर भी आप को युद्ध की जल्दी है तो मैं आपको अपना स्तीफा दे देता हूँ I

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प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी से बात करते हुए फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा, ठीक है सैम आप तैयारी कर लो और जब आप पूरी तरह से तैयार हो जाना आप मुझे बता देना हम तब पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करेंगे और शेख मुजीबुर्रहमान को आज़ाद करवाएंगे साथ ही ढाका को एक नया देश भी बनवा देंगे I

यह सब बात अप्रैल के महीने की थी उसके बाद नवंबर आते-आते यह तय हो चुका था कि भारत और पाकिस्तान के मध्य युद्ध होना तय है यह होकर ही रहेगा I और इसीक्रम में 3 दिसंबर को प्रधानमंत्री कलकत्ता (कोलकाता) में एक जनसभा को संबोधित कर रही थी तभी उनके पास शाम को पूर्वी कमान के कमांडर इन चीफ़ जगजीत सिंह अरोड़ा उनके पास पहुंचे और उन्होंने श्रीमती गांधी को इस बात की जानकारी दी कि पाकिस्तानी सेवर जेटों और स्टार फाइटर्स ने भारत के पठानकोट, अमृतसर, जोधपुर, अवंतीपुर, अंबाला, उत्तरलाई, आगरा और श्रीनगर के हवाई अड्डों पर जमकर बमबारी शुरू कर दी है I

इतना सुनते ही श्रीमती गांधी तुरंत ही दिल्ली के लिए रवाना हो गयी और रात में वह अपने विशेष विमान से दिल्ली पहुंची और दिल्ली पहुँचते ही श्रीमती गांधी ने तुरंत ही मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई और उसके बाद विचार विमर्श करने के बाद उन्होंने राष्ट्र के नाम अपना सन्देश दिया I

जिसमें उन्होंने कहा था कि, “पाकिस्तान ने हमारे खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है, आज पाकिस्तानी हवाई जहाजों ने भारतीय सीमा में घुसकर श्रीनगर, अवंतीपुर, पठानकोट, अमृतसर, अंबाला, जोधपुर, आगरा और उत्तरलाई के एयर फ़ोर्स स्टेशनों पर हमला बोल दिया है I अब हम उसका जवाब देने के लिए मजबूर है और मैं आशा करती हूँ साथ ही मुझे इस बात पर पूरा विश्वास है कि भारत की जनता और सभी पार्टियों के नेता एक है देश सुरक्षा, एकता -अखंडता और स्वाभिमान के लिए अपने व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर एक साथ खड़े हैं  I

अब भारतीय सेना जिस बात का इंतज़ार कर रही थी या फिर जिस युद्ध की शुरुआत वह स्वयं करने जा रही थी वह काम और अधिक आसान हो गया था क्योंकि पाकिस्तान ने इसकी शुरुआत खुद ही भारत के 11 हवाई अड्डों, रडार स्टेशनों पर हमला बोल कर कर दिया था I अब भारत को तो बस युद्ध करते रहना था I भारतीय सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ ने अपनी सेना को पूर्व और पश्चिमी सीमा पर दोनों तरफ तैनात कर दिया लेकिन उन्होंने पश्चिमी सीमा पर सैनिकों को केवल रक्षात्मक शैली में युद्ध करने के लिए कहा और पूर्व में सेना ने एक-एक करके पाकिस्तान के सभी प्रदेशों पर विजय हासिल करनी शुरू कर दी I

आईएनएस विक्रांत जिसने गाजी पनडुब्बी को नष्ट किया था
आईएनएस विक्रांत जिसने गाजी पनडुब्बी को नष्ट किया था

भारत और पाकिस्तान के इस युद्ध में सेना के तीनों कोरों थल, जल और वायु ने बेहतरीन जुगलबंदी का उदहारण पेश किया था I भारतीय थल सेना जैसे ही पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) में घुसी युद्ध के दूसरे ही दिन भारतीय जल सेना (इंडियन नेवी) ने पाकिस्तान के सबसे प्रमुख कंराची बंदरगाह और करांची शहर के ऊपर बम वर्षा कर दी I और इस हमले के कुछ दिन के अंतराल पर एक बार फिर से भारतीय नेवी ने करांची पर हमला बोला और ऐसा तांडव किया कि जानकार कहते है कि करांची बंदरगाह और शहर तक़रीबन 15 दिनों तक जलता रहा था I

उसके बाद इंडियन नेवी बंगाल की खाड़ी में तैनात पाकिस्तान की गाजी पनडुब्बी को भी विशाखापत्तनम के नजदीक समुद्र में ही डुबा दिया I और साथ ही भारतीय वायु सेना ने भी पाकिस्तान के सभी प्रमुख हवाई अड्डों और प्रमुख सैन्य संस्थानों पर ऐसी बमबारी की पाकिस्तान की कमर टूट गयी और युद्ध प्रारंभ होने के मात्र 13 दिनों के भीतर ही सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ ने भारत के पूर्वी एरिया कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को 16 दिसंबर 1971 को फोन किया और कहा “जैकब” आप तैयार हो जाइए और नियाजी का आत्मसमर्पण करवाने की तैयारी करिए I

पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण –

13 दिसंबर की शाम आते-आते भारतीय सैनिकों ने ढाका को चारों ओर से घेर लिया था I और उस समय ढाका के मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनट पर अपने एडीसी के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल नियाज़ी के लिए एक नोट लिखा- ”माई डियर अब्दुला आई एम हियर I द गेम इज ओवर I ” मेजर जनरल गन्धर्व नागरा ब्याक्तिगत तौर पर भी नियाजी को जानते थे I

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जिस समय लेफ्टिनेंट जनरल जैकब नियाजी के पास ढाका पहुंचे थे और नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तों को समझा रहे थे उस समय नियाजी की आँखों में आंशू थे I और यह ऐतिहासिक आत्मसमर्पण ढाका के रेसकोर्स मैदान में हुआ था I जहाँ पर बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाली मुक्तिवाहिनी और भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी फौज के 93,000 जवानों ने आत्मसमर्पण किया था I पाकिस्तानी सेना की तरफ से जनरल ए.ए.नियाजी और भारत की तरफ से पूर्वी कमान के कमांडर इन चीफ़ जगजीत सिंह अरोड़ा ने आत्मसमर्पण के कागजातों पर दस्तखत किये थे I

बांग्लादेश की आज़ादी के बाद शेख मुजीबुर्रहमान के साथ प्रधानमंत्री श्री मती इंदिरा गाँधी
बांग्लादेश की आज़ादी के बाद शेख मुजीबुर्रहमान के साथ प्रधानमंत्री श्री मती इंदिरा गाँधी

और इस आत्मसमर्पण के बाद भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सबसे पहले एक नए देश बांग्लादेश के उदय और उसके अस्तित्त्व की घोषणा की थी I उसके बाद शेख साहब को छुडवा दिया गया और फिर बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश की यात्रा की और उससे पहले फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ खुद भी बांग्लादेश गए और अपने जवानों से उन्होंने सीधे मुलाकात की I

इस तरह से बांग्लादेश का उदय हुआ और पूर्वीपाकिस्तान और जिन्ना के भारत को परेशान करने के सपने का अंत भी हो गया I

 

धन्यवाद !

धर्मेन्द्र सिंह

 

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