ऐतिहासिक कजली मेले की धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है रौनक



जालौन (ब्यूरो)-
‘बड़े लड़इया महुवे वाले, इनकी मार सही न जाए’ को उजागर करता ‘कजली मेला’ जो रक्षाबंधन के दूसरे दिन कोंच चैराहे के पास लगता है, उसकी रौनक धीरे-धीरे कम होती जा रही है। वर्तमान में अतिव्यस्त व आधुनिक जीवन शैली के चलते लोग पुरातन परंपराओं को भूलते चले जा रहे हैं। इसके चलते इस प्रकार के आयोजनों में उनकी रूचि भी खत्म होती चली जा रही है। यदि यही हाल बना रहा है, तो आगामी पीढ़ियों के लिए इस प्रकार के आयोजन सिर्फ किताबों में पढ़ने के लिए ही रह जाऐंगे। इतना ही नहीं पूर्व में ऐसे आयोजनों में राजनैतिक दलों के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे, परंतु अब वह भी इस प्रकार के आयोजनों से दूरी बनाने लगे हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र में वर्षों से कजली पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता रहा है। दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान व महोबा के राजा परमाल से हुए युद्ध के चलते बुंदेलखंड की बेटियां कजली (भुजरियां) को रक्षा बंधन के दूसरे दिन दफन कर सकी थीं। इस युद्ध में आल्हा व ऊदल ने अदम्य साहस दिखाते हुए पृथ्वीराज चैहान की सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में रक्षाबंधन के दूसरे दिन को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

नगर में मलंगा नाले के पास वर्षों से लगने वाले कजली मेले में हिंदू, मुस्लिम सहित राजनैतिक दलों के नेता, साधु संत आदि मलंगा नाले के पास अपने-अपने स्टॉल लगाकर आने वाले लोगों से मिलते थे। तथा एक दूसरे को कजली (भुजरियां) देकर रक्षा बंधन पर्व की बधाई देते थे। इसके बाद देर शाम को कजली को मलंगा नाले में विसर्जित कर मेले का समापन किया जाता था। इस दौरान पुलिस व्यवस्था भी चाक-चैबंद रहती थी। परंतु आज की व्यस्ततम जीवन शैली के चलते लोगों का रूझान ऐसे आयोजनों की ओर से विमुख होता चला जा रहा है। अब तो मेला सिर्फ औपचारिक ही नजर आता है। अब मेले में न तो पहले रौनक दिखती हैं और न ही भीड़ नजर आती है। वहीं राजनैतिक दलों ने भी इससे किनारा कर लिया है।

मंगलवार को कोंच चैराहे पर लगे कजली मेले में बच्चों के खिलौने, झूले, चाट, पकौड़े, खजला, लहिया, पट्टी आदि के काउंटर तो खूब लगे। परंतु इन पर खरीददार कम ही नजर आए। जिससे दुकानदारों के चेहरे मायूस नजर आए। दुकानदार राकेश कुमार, विनोद, पप्पू, अल्ताफ आदि बताते हैं कि मेले की रौनक कुछ साल पूर्व तक अलग ही नजर आती थी। परंतु धीरे, धीरे मेले रौनक कम होती जा रही है। पिछले दो, चार सालों से लगता है कि लोग कजली मेले के बारे मं भूल ही चुके हैं। अब मेले बड़े तो छोड़ ही दें, बच्चे भी कम ही नजर आते हैं।

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