अखिलेश की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे अरूण

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सुलतानपुर(ब्यूरो)- ब्यूरो सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव द्वारा दो दो चुनावी सभायें विकास के लिए करोड़ो की सौगात भी जनता का दिल नही जीत सकी। विकास के कामों पर विधायक का कारनामा भारी पड़ा। बात हो रही है उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले की सदर विधान सभा की जिसका मिजाज हमेसा अलग रहा यह वह सीट है जहां की जनता विधायक चुनने के साथ ही यू0पी0 की सरकार भी तय करती है। आजादी के बाद से अब तक इस सीट से जिस दल के विधायक हुये उसी दल की यूपी में सरकार बनी इस लिहाज से यह सीट सभी दलों के लिए महत्वपूर्ण रही। जिले की कुल 5 विधानसभा सीटों में इसौली को छोड़ कर सपा का प्रदर्शन कुछ खास नही रहा। लेकिन सदर सीट पर सपा प्रत्याशी का तीसरे पायदान पर जाना सभी को चकित कर रहा है। यहां सदर सीट अन्य सीटों से अलग इसलिए देखी जा रही है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विकास के लिए सर्वाधिक धन इसी विधानसभा को दिया था।

यहां से विधायक रहे अरूण वर्मा पर एक युवती के साथ गैंगरेप व गैंगरेप के बाद हुई युवती की हत्या जैसे आरोप लगने के बाद पार्टी ने टिकट काटा तो भी अखिलेश ने यहां के विधायक पर भरोसा रख टिकट दिया था। यही नही प्रदेश की यह एकलौती सीट थी जहां अखिलेश ने दो चुनावी सभायें की थी और विधायक की मांग पर सर्वाधिक पैसा विकास के लिए दिया और उन्हें स्पेशल सुरक्षा भी मुहैया करायी थी। सपा ने इस बार जब अरुण वर्मा का टिकट काट दर्जा प्राप्त मंत्री डा0 संदीप शुक्ला को यहां से मैदान में उतारा था। तो अखिलेश यादव नाराज हो गये थे इसी बीच पार्टी में उठा पटक बाद जब सत्ता और संगठन दोनो की कमान अखिलेश यादव को मिली तो उन्होने संदीप शुक्ला का न सिर्फ टिकट काटा बल्कि उनको मंत्री पद से भी बर्खास्त कर दिया यही नही अर्से से दर्जा प्राप्त मंत्री पद पर काबिज चली आ रही डा0 संदीप शुक्ला की पत्नी डा0 सुरभि शुक्ला को भी बर्खास्त कर दिया था। लेकिन जिस उम्मीद के साथ अखिलेश यादव ने अरुण वर्मा पर भरोसा जताया था अरूण वर्मा अखिलेश यादव के उस भरोसे को कायम नही रख सके। जीतना तो दूर की बात तीसरे स्थान पर ही उन्हे संतोष करना पड़ा। आजादी के बाद पहली बार इस सीट पर हुआ यादव कुर्मी गठजोड़ पांच साल में ही दरक गया।

वर्ष 1993 के चुनाव में पहली बार इस सीट से सपा बसपा गठबंधन में अब्दुल रईस यहां से विधायक चुने गये थे उसके बाद पूर्व मंत्री रामरतन यादव, अब्दुल रईस इस सीट से अजमाईस करते रहे लेकिन सफलता हाथ नही लगी। सपा इस सीट पर हारती ही रही। वर्ष 2012 के चुनाव में टिकटार्थियो की लम्बी फेरिस्त को दरकिनार कर एक नये चेहरे 25 वर्षीय अरूण वर्मा पर भरोसा जताते हुए उन्हे इस सीट से चुनावी मैदान में उतारा। सबसे कम उम्र में ही अखिलेश यादव की चली लहर में अरूण वर्मा यहां से विधायक बन गये। लेकिन 2017 के इस चुनाव में भाजपा ने कुर्मी बाहुल्य इस सीट पर नया दांव खेला और कुर्मी मतों को लुभाने के लिए बसपा छोड़कर कर आये सीताराम वर्मा को इस सीट से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया भाजपा की यह चाल ही रही कि सीताराम वर्मा ने लम्भुआ सीट से अपनी दावेदारी जतायी थी जिसे दरकिनार कर भाजपा ने सदर से उन्हेें अपना उम्मीदवार बनाया। वे इस सीट से बीस हजार से अधिक मतों से विजयी हुये। सपा के प्रत्याशी रहे अरूण वर्मा यहां तीसरे स्थान पर चले गये। बसपा के रास्ते भाजपा में आये कुर्मी बिरादरी के कद्दावर नेता सीताराम वर्मा को जिस तरह भाजपा ने आगे बढ़ाया है उससे 2012 में बना सपा की ताकत माना जाने वाला यादव कुर्मी गठजोड़ यहां दरक गया। 2012 में सपा प्रत्याषी के साथ रहे लगभग 70 फीसदी कुर्मी मतदाताओं की पहली पसंद इस बार भाजपा प्रत्याशी सीताराम वर्मा रहे। आजादी के बाद पहली बार वर्ष 2012 के चुनाव में निर्मित इस यादव कुर्मी गठजोड़ के अल्पजीवी होने का अनुमान तो सभी को था लेकिन इसका अंदाजा किसी को नही रहा कि भाजपा से सजातीय प्रत्याशी आने के बाद जो कल तक यहां अखिलेश यादव का गुणगान कर रहे थे इतनी तदाद में भाजपा की ओर मुड़ जायेंगे। एक बुजुर्ग समाजवादी नेता कहते है कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की इस क्षेत्र व प्रत्याशी पर इतनी मेहरबानी के बाद भी पार्टी की साख अरुण वर्मा न बचा सके वे इसके पीछे जमीनी कार्यकर्ताओ की उपेक्षा का परिणाम मानते है। जिन्होने पार्टी प्रत्याशी को आईना दिखाया है।

रिपोर्ट- संतोष कुमार यादव

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