अर्जुन ने श्री कृष्ण से महाभारत के युद्ध के मैदान में सवाल पूछा कि –

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shri krishna

अर्जुन – हे मधुसूदन आप कहते हो कि सर्वब्यापी परमात्मा की शरण में आओं, परन्तु उस परमात्मा का स्वरुप क्या हैं ..? मुझे अपना वह स्वरुप बताओ जिसकी पूजा की जाय …! क्यू कि संसार में भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा करते हैं ….! क्या वह पाप हैं …?

श्री कृष्ण – नहीं ! अर्जुन पूजा कभी पाप नहीं होती …! और जो प्राणी भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा करते हैं वह वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं …..
क्यू कि इस समस्त संसार के सभी कणों में मैं ही समाया हूँ, ग्यानी जन अपने ज्ञान चछुओं से मुझे हर जगह हर प्राणी के अन्दर देख सकते हैं….एक विद्वान् ब्राम्हण के अन्दर मैं हूँ तो एक चंडाल के अन्दर भी मैं हूँ, गौ में भी मैं हूँ, कुत्ते में भी मैं हूँ, हाथी में भी मैं हूँ तो चीटी में भी मैं हूँ ….

श्लोक – विद्या विनय सम्प्पने, ब्रह्मणे गवि हस्तनी
शुनि चैव,स्वपाके च, पंडिताह सम्दार्सिनः

जलचर, थलचर और गगनचर, श्रस्टी में जितने जीव हैं सारे
सबमें वहीं करतार समाया, रूप हैं नाम हैं न्यारे,न्यारे
स्थावर, जंगम, जड़, चेतन सब, उसने सजाए, उसने सँवारे
नर में, पशु में, ऊँच में, नीच में, योगी, ब्रम्ह में, ब्रम्ह निहारे
सबमें वहीँ करतार समाया, रूप हैं, नाम हैं, न्यारे,न्यारे….

हिंदी कविता सोर्स – श्री कृष्णा रामानंद सागर कृत

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