कोरम पूरा न होने से निरस्त हुआ अविश्वास प्रस्ताव

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रायबरेली ब्यूरो : ‘बड़ा शोर सुनते थे, पहलू में दिल का। जो चीरा तो कतराये खूं भी न निकला’ यह शेर जिला पंचायत अध्यक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर पूरी तरह मौजूद है। जिसमें लगभग पच्चीस दिनों की गहमा-गहमी के बाद नतीजा शिफर निकला।

जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी राजनीतिक दांव पेच के अखाड़े के रूप में परिवर्तित हो चुकी है। पहले तो अध्यक्ष के चयन प्रक्रिया के दौरान ही जमकर खेमेबाजी का खेल खेला गया। पार्टी नैतिकता एवं सिद्धांतो का खुला उल्लंघन कर लोगो ने अपने ही प्रशाधन के लिये जमकर एक दूसरे की टांग खीची। मोल भाव का दौर चला और आयाराम-गयाराम का खूब खेल खेला गया। पैसा और पावर ने अंत में निर्णायक की भूमिका निभाई। जिसके चलते अवधेश प्रताप सिंह अंततोगत्वा अध्यक्ष की कुर्सी हथियाने में कामयाब रहे। यह अलग बात है कि यह बात कुछ लोगों को हजम नहीं हुई और उन्होंने नई विशात पर गोटे बिछानी शुरू कर दी थी। जिसके चलते कुर्सी मिलने के आठ माह के अंदर ही उनके विरूद्ध जिलाधिकारी के समक्ष अविश्वास का प्रस्ताव पेश किया गया। जिलाधिकारी ने अंदुरूनी राजनैतिक हालात भापते हुये अपने आप को इससे अलग करने की जुगत भिड़ाई और जनपद न्यायाधीश को पत्र लिखकर किसी न्यायिक अधिकारी को चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी सौपने की अपील की। परिणाम स्वरूप अपर जिला जज चतुर्थ की देखरेख में शनिवार को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा एवं मतदान कराने की जिम्मेदारी मिली। जिसके चलते अपर जिलाजज ने जिला पंचायत सभागार में सभी निर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों को प्रस्तुत हो अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा एवं मतदान के लिये आमंत्रित किया। आश्चर्यजनक तथ्य यह रहा कि शपथ पत्र के साथ जिलाधिकारी के समक्ष जो 32 जिला पंचायत सदस्य अविश्वास प्रस्ताव की मांग को लेकर उपस्थित हुये थे। चर्चा के दौरान मात्र 25 सदस्य ही सदन में उपस्थित हो सके। बताते चले कि जिला पंचायत में कुल सदस्यों की संख्या 52 है। इसलिये अविश्वास प्रस्ताव पारित करने के लिये कम से कम 27 सदस्यों का उपस्थित रहना अनिवार्य है। इस प्रकार कोरम पूरा न होने के चलते पर्यवेक्षणीय अधिकारी बने अपर जिलाजज ने अविश्वास प्रस्ताव को निरस्त कर दिया।

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