शहर का आयुर्वेदिक अस्पताल खुद हुआ बीमार

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मैनपुरी(ब्यूरो)- सरकार भले ही गरीबों को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने में गोल्ड मैडिल जीतने का दम भरती हो परन्तु लापरवाह और हद गर्ज हो चुके कर्मचारियों के चलते घंटों मरीज दवा के लिये खड़ा रहे। पर दवा के नाम पर खाली कुर्सी और दुआ भी बमुश्किल नसीब होती है। कर्मचारियों के वेतन बल पर चल रहे अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों की दशा किसी घुड़साल से कम नहीं दिखती। जब मुख्यालय पर स्थिति अस्पतालों के यह हालात है तो ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों की दशा क्या बयां करती होगी? जहां डाक्टर कभी जाता, कम्पाउडर अपनी दुकान चलाता है और बाकी कर्मचारी अस्पताल खोल तो देते है। परन्तु पूरे दिन पत्ते फेंकते रहते है।

बात जनपद के उन अस्पतालों की चल रही है। जिनके पास वेतन के लिये लाखों रूपये हर माह ग्रान्ट भेज दी जाती है। परन्तु दवा के नाम पर हर मरीज को बड़े वाले बाबा जी का ठुल्लू ही थमा दिया जाता है। नगर के पुराने महिला अस्पताल में क्षेत्रीय आयुर्वेद एवं यूनानी निदेशालय द्वारा तीस शैया का आयुर्वेदिक अस्पताल करीब 20 साल से संचालित है। यहां दो चिकित्सक फार्मासिस्ट नर्स, वार्ड बाॅय, बार्ड आया और चौकीदार तक नियुक्त है। यहां नहीं है तो केवल दवाईयां और जो दवाये है उन्हें देने के लिये योग्य फार्मासिस्ट के पास इतना समय नहीं है कि वह मरीजों को दवा दे सकें। वह पूरे दिन विभाग और अपनी फाइले लिये घूमता रहता है और मजबूरन मरीजों को बाहर से दवा लेने के लिये मजबूर होना पड़ता है। इस अस्पताल के समकक्ष जनपद के विभिन्न कस्बों और गांवों में भी आयुर्वेदिक अस्पताल कभी खुलते है तो दवा नहीं मिलती, डाक्टर मिल भी जाता है तो उसे यह पता नहीं कि अस्पताल में कौन सी दवा किस मर्ज के लिये भेजी गई है।

गर्मी के दौरान लगातार बढ़ते तापमान से जहां बीमारियां इंसान का जिस्म खोखला कर रही हैं। वहाँ इन अस्पतालों में सितोपलादि चूर्ण, लवड़ भास्कर चूर्ण, चित्रक बटी, गंधक रसायन बटी जैसी जीवनदायनी दवाये भी मौजूद नहीं है। यदि है भी तो उन्हे लेने के लिये बाबूजी की जी हजूरी जरूरी है। इस संबंध में क्षेत्रीय यूनानी आयुर्वेदिक अधिकारी से सम्पर्क किया गया तो उन्होने बताया कि दवाओ की खरीद करने वाली कमेटी में सभी लोग चिकित्सा और दवाओं के जानकार नहीं होते दवा आपूर्ति करने वाली कम्पनियों ने जो समझा दिया वहीं दवाये खरीद ली गई। अब वह मरीज के काम आये या कूड़े में फेंकी जाये इसे देखने ऊपर वाला अधिकारी नहीं आता।

रिपोर्ट- दीपक शर्मा 

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