बंदरों की बढती संख्या के किशनी के लोग हलकान

0
110
प्रतीकात्मक फोटो

किशनी/मैनपुरी (ब्यूरो)- बंदरों की निरंतर बढ रही संख्या किशनी के लोगों के लिये अब परेशानी का सबब बन चुकी है। बन्दरों को यदि किशनी का आतंक कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

करीब तीस वर्ष पूर्व किशनी के सदर बाजार में एक पाकड का भारी भरकम बृक्ष हुआ करता था। संख्या में कम सारे बंदर इसी बृक्ष पर हमेशा उछलकूद करते देखे जा सकते थे। सारे बंदर  किसी फल वाले की दुकान से या सब्जी बालों की कृपा पर निर्भर थे। शायद ही कभी कोई बंदर किसी के घर की मुंडेर पर बैठा देखा गया हो। पर पिछली बीती सालों में इनकी संख्या में बेतहासा वृद्धि हुई है। अब बंदरों के खौप का आलम यह हो चुका है कि लोग खाश कर महिलायें और बच्चे अपनी ही छतों पर जाने से डरने लगे हैं। कितने ही लोग बंदरों के हमलों में घायल हो चुके हैं।

गैंग बनाकर चलते है बन्दर-
अब इनकी हिम्मत इतनी बढ चुकी है कि ये गैंग बना कर किसी पर भी हमला कर घायल कर सकते हैं। सिर्फ कुछ खास लोगों के घरों को छोड दिया जाय जिन्होंने अपने घरों की छतों को लोहे के जाल से ढंक लिया है तो बाकी हर आमोखाश इनसे परेशान और दुःखी है। घरों में घुस कर जूते, चप्पलों, कपडों इत्यादि को उठा कर काट काट कर बरबाद कर देना अब इनका शगल बन चुका है। निकट की कुछ सालों में इन्होंने अपनी सीमा क्षेत्र में विस्तार भी कर लिया है। चन्द्रपुर ,बटपरू, खडेपुर, पृथ्वीपुर, नगला घासी गोकुलपुर, उदयपुर, नगला मंगद तथा गोकुलपुर इत्यादि गांवों में भी किशनी के बंदर आंतक के पर्याय बन चुके हैं।

बंदरों ने किया लोगों का जीना दुश्वार-
इनके आतंक के कारण लोगों ने कपडे तथा अनाज तक अपनी छतों पर सुखाने बंद कर दिये हैं। यदि मजबूरन किसी को येसा करना भी पडता है तो उसे भी लाठी डण्डा लेकर छत पर सूखना पडता है।किशनी व आसपास के लोग गमले,फूलों के पौधे तथा सब्जी तक पैदा नहीं कर पा रहे हैं।जो किसान मक्की की फसल पैदा करते हैं। उनको ये दुष्ट वानर बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।

किशनी में किसी के भी घर कोई फलदार बृक्ष ढूंढने से भी नहीं मिल सकेगा। बंदर मेहनत से लगाये पेड और पौधों को मिनटों में तोड कर खत्म कर डालते हैं।स्वभाव ये अत्यंत कामी,क्रोधी और झगडने की पृवृत्ति के होने व हर बंदर एक दूसरे को काटने के कारण बुरी तरह से घायल है।जब भी लोग अपनी छतों पर जाते हैं इनकी बैठने की जगहैं खून से सनी मिलतीं हैंे।इतना ही नही इनके इलाके भी बंटे हुए होते हैं। सीमाओं के अतिक्रमण पर इनमें गैंगवार भी हो जाता है। उस समय ये इतने हिंसक हो जाते हैं कि यदि कोई इंशान इनके बीच फंस जाय तो उसकी भी शामत आ जाती है। किशनी का हर आमोखाश बंदरों के कारण एक खौप भरी जिन्दगी जीने को मजबूर है और प्रशासन चुपचाप आंखें मूदे ऐसे बैठा है जैसे कुछ हुआ ही न हो। किशनी के लोगों की जिलाधिकारी से मांग है कि जैसे भी हो इन आतताई बंदरों ने बचाने को कोई तो इंतजाम किया जाय।

चुनावी वादें का बन चुके है हिस्सा ये बन्दर-
पिछले निकाय चुनाव में लोगों ने मांग की थी कि जो भी  किशनी नगर पंचायत के अन्तंगत आने बाले गांवों का समुचित विकास करायेगा साथ ही जनता को बंदरों के आतंक से निजात दिलायेगा  उसे ही चेयरमैन चुना जायेगा। वर्तमान चेयर मैन जैसीराम यादव ने भी इस बारे में कुछ मौखिक पहल की थीं। पर गत पांच सालो में इस ओर एक भी कदम नहीं उठाया गया। अब इस बार भी चुनाव सर पर है। लोग शायद अपनी इस खौपनाक परेशानी को नजरअंदाज नहीं कर सकेंगे।

रिपोर्ट- दीपक शर्मा

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY