बसंत पंचमी के अवसर पर मनाया जा रहा है सूर्यकान्त निराला का जन्मदिन

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बीघापुर/उन्नाव (ब्यूरो)- महामानव के जीवन को अक्षरशः बताती है। अलमस्त विद्रोही कवि के रूप में उनका धधकता रुलाता उनका साहित्य ही उनका बताती है। हिंदी साहित्य जगत के इस कालजयी रचनाकार का आज बसंत पंचमी को साहित्य जगत के मंचों पर 120 वा जन्म दिवस मनाया जायगा। 21 फरवरी 1896 को जन्मे निराला ने अपने वास्तविक जन्म दिन को न मानकर प्रकति के सबसे सुर मय ऋतु बंसत पंचमी के दिन को अपना जन्म दिन माना।

SOORYKANT NIRALA

उनकी साधना स्थली गढ़ाकोला राजनैतिक मानचित्र पर ओझल होने के करण आज भी विकास की बाँट जोह रही है। उनका घर के पीछे का हिस्सा खाफी कुछ ढह चुका है। निराला स्मारक समिति के प्रयासों से गाँव में पार्क पुस्तकालय जरूर बना लेकिन जो भव्यता होनी चाहिये थी वह नहीं प्राप्त हो सका। स्मारक समिति के अध्यक्ष गौतम दीक्षित व महामंत्री रमेशचन्द्र तिवारी के प्रयास भी वर्तमान शासन प्रशासन से बहुत कुछ नहीं पा सके।

समाजसेवी आशुतोष शुक्ल ने निराला के घर के आगे की हिस्से का निर्माण कराया है वही क्षेत्रीय विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने भी समिति को उनके घर के निर्माण के लिए धन देने की बात कही है। हिंदी साहित्य के महान शब्द शिल्पी तथा कबीर के रूप में निराला ने आर्थिक विषमता, छुवाछूत, ऊँचनीच, सामाजिक भेदभाव मिटाने को लिखा।

उनके साहित्य में सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की भावना के साथ दलितों, शोषितों, पीड़ितों, गरीबों, किसानों, मजदूरों भिखारियों के प्रति अगाध पीड़ा का समावेश मिलता है और पूंजीपतियों व सत्त्ता सामंतों के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद नजर आता है।
प. सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला ने अवश्य ही समाजवाद के प्रष्ट पोषक थे लेकिन आज समाजवाद की परिभाषा से हटकर हिन्दी साहित्य के इस ध्रुव तारे ने समाज के निर्बल वर्ग अपने प्रिय पात्र चतुरी चमार के पुत्र अर्जुन को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था उस निराला के गाँव को प्रशासनिक व राजनैतिक उपेक्षा के चलते वो पहचान नही मिल सकी जो मिलनी चाहिए थी।

निराला की रचनाओं का गवाह रहा उनका मकान ढह रहा है उनकी स्मृति में बनी पार्क उजाड़ खण्ड हो चुकी है। साहित्य कार दर्द कानपुरी, कवि एवं संपादक डॉ मान सिंह, साहित्यकार वासुदेव अवस्थी, रामकुमार यादव कुमुदेश, प्रशासनिक उपेक्षा से दुखी है। साहित्यकारो का कहना है की विश्व पटल पर हिंदी का सर ऊँचा करने वाले महाप्राण निराला अपने पैत्रक ग्राम गढ़कोला में आज भी उपेक्षित है।
रिपोर्ट- मनोज सिंह

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