21 भारतीय सैनिकों ने 10 हजार अफगानी सैनिकों को छठी का दूध याद दिला दिया था

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सिक्खों के अंतिम गुरु, गुरु गोविन्द सिंह के द्वारा कहा गया यह पवित्र और जोश भर देने वाला यह नारा ‘सवा लाख ते एक लडावा, तां गोविन्द सिंह नाम धरावा’को सारागढ़ी किले की रक्षा करने वाले उन 21 बहादुर योद्धाओं ने सच साबित कर दिया था | जिनको सम्मान देने के लिए बाद में ब्रिटिश सेना ने उन्हें तब युद्ध के दौरान बहादुरी के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान, ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट’ से सम्मानित किया जाता था | आपको बता दें कि तब सैनिकों की बहादुरी को सम्मानित करने के लिए दिया जाने वाला ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट’ आज के परम वीर चक्र के बराबर का सम्मान होता है |

आखिर ऐसा क्या हुआ था –
आखिर इन 21 सिख रेजीमेंट के इन बहादुर सैनिकों को इतना सम्मान क्यों दिया जाता है | आखिर ऐसा इन लोगों ने क्या किया था तो आपको आज बता दें कि यह घटना तब कि है जब भारत आज़ाद नहीं था बल्कि भारत माता गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई थी और भारत पर अंग्रेजों का आधिपत्य था | अंग्रेज एक-एक करके समूचे भारत पर अपना आधिपत्य जमा चुके थे |

यह घटना 12 सितम्बर 1897 की है | अंग्रेजो और अफगानों के बीच 1839 से 1919 के बीच 80 सालों मे तीन बड़ी लड़ाईयां हुई | 1897-98 के युद्ध में सिख रेजिमेंट अग्रिम मोर्चे पर थी | इस रेजिमेंट की चौथी बटालियन के 21 जवान सरगढ़ी की सैनिक चौकी पर तैनात थे | इनका नायक था हवलदार ईशर सिंह | इस टुकड़ी को हर हालत में चौकी की रक्षा करने का आदेश मिला था |

बता दें कि 12 सितम्बर 1897 के दिन सुबह होते ही तक़रीबन दस हजार से भी अधिक अफगान सैनिकों ने इस चौकी पर हमला बोल दिया | उस समय उनके सामने सारागढ़ी किले की रक्षा करने के लिए सिख रेजिमेंट के मात्र 21 बहादुर जवान ही मौजूद थे | दुश्मन को तीव्र गति से अपनी आते देखकर सिख रेजिमेंट के चौथी बटालियन के जवानो ने भी चौकी के चारो कोनों पर मोर्चा जमा लिया था | ज्ञात हो कि इस टुकड़ी के साथ उनका अपना रसोईया भी था उसने भी बंदूक संभाली और मोर्चे पर डट गया | सबसे बड़ी बात यह थी कि एक ओर जहां दस हजार अफगान लड़ाके और दूसरी ओर मात्र 21 सिख सैनिक यानी एक- एक खालसे के मुकाबले में पांच सौ अफगान थे |

लेकिन इन सिख योद्धाओं ने न ही पीछे हटने के बारे में सोचा और न ही आत्मसमर्पण करने के बारे में ही | उन्होंने तय कर लिया था कि अब इस युद्ध में या तो विजय या फिर वीरगति | बस उसके बाद सारागढ़ी के किले के ऊपर चारों तरफ से अफगानों ने भीषण गोलियां दागना शुरू कर दिया | अपने रसोइये के साथ मिलकर कुल 22 सिख योद्धा अपने दुश्मन की हर गोली का जवाब दे रहे थे और इनकी हर गोली पर एक दुश्मन का नाम लिखा होता था |

आसमान में सूरज धीरे-धीरे चढ़ने लगा था और जैसे-जैसे आसमान में सूरज अपनी चमक बिखेर रहा था ठीक उसी तरह से इन सिख योद्धाओं ने भी अपनी चमक बिखेरनी शुरू कर दी और इन सूर्यों की चमक के सामने अफगान लड़ाके झुलस रहे थे | लेकिन कब तक यह होने वाला था धीरे-धीरे करके एक-एक सिख योद्धा वीरगति को प्राप्त होने लगा था और सूरज के ढलने तक सभी सिख योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे | लेकिन तब तक भारतीय सेना के सिख रेजिमेंट के इन बहादुर योद्धाओं को जिस किले की रक्षा के लिए तैनात किया गया था उसे वे बखूबी निभा चुके थे |

जब तक आखिरी सिख योद्धा की बन्दूक शांत होती तब तक उनकी मदद करने के लिए और भारतीय फौज वहां पहुँच चुकी थी | उसके बाद भारतीय फौज की की मार से अफगान सेना गाजर-मूली की तरह साफ होने लगी | दुश्मन भागने लगे और भागते ही गये | सारागढ़ी का किला वह अंत तक अविजित ही रहा | जब बाद में किले के आस-पास के शवों की गिनती की गयी तब जाकर यह देखा गया कि वहां पर 600 से भी ज्यादा शव पड़े हुए थे | अंग्रेज यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता था |

बाद इन शहीद वीर सिख सैनिकों को मरणोपरांत उस समय का सबसे बड़ा मिलेट्री पदक ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट’ से सम्मानित किया गया | कहानी अभी यही नहीं समाप्त हुई बल्कि आज भी भारतीय सेना इन बहादुर योद्धाओं के शहीदी दिवस 12 सितंबर को सारागढ़ी दिवस के रूप में मनाती है | वीरगति को प्राप्त हुए सभी जवान फिरोजपुर और अमृतसर जिलों के थे | इसलिये इन वीरो कीं याद में दो गुरूद्वारे इन दोनों जिलो में बनायें गये | एक सरगढ़ी गुरुद्वारा अमृतसर स्वर्ण मंदिर के पास हैऔर दूसरा फिरोजपुर सैनिक छावनी में हैं |
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