भारत में कृषि की स्थिति दी प्रतिदिन ख़राब होती जा रही है

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जालौन (ब्यूरो)- अब खेती किसानी में नजर नहीं आती फसल कटने के बाद घर की कन्याओं की अंजुरी भरने की प्रथा इसके अलावा खेतों से सीला बिनने की प्रथा भी समाप्त हो चुकी है। कृषि के आधुनिकीकरण ने उक्त सभी प्रथाओं को खतम कर दिया है।

गौसंपदा संरक्षण शोध संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष अनिल शिवहरे, गौरक्षा अभियान के जिला संयोजक राजासिंह सेंगर गधेला संयुक्त रूप से बताते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। यहां की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गावों में निवास करती है तथा उनकी आय का मुख्य स्रोत कृषि ही है। परंतु जबसे हमने पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण शुरू किया है। तबसे भारत में कृषि की स्थिति काफी बदतर होती जा रही है।

कृषि करने के आधुनिक तौर-तरीकों ने हमारी परंपरागत कृषि करने के तरीकों को काफी हानि पहुंचायी है। पूर्व में किसान जब खेतों में फसल कट जाती थी तब खलिहान से फसल उठाने से पहले अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर घर की कन्याओं को अंजुरी भरकर खेत की उपज देता था। तत्पश्चात् फसल को उठाता था।

इसी प्रकार फसल की कटाई के समय करपा बनाए जाते थे। जिन्हें उठाते समय कुछ बालियां वगैरह वहीं खेत में छूट जाती थीं, जिन्हें सिला कहा जाता है। उन्हें किसान उठाकर घर नहीं लाता था। बल्कि फसल कटने के बाद गांव के गरीब खेतों में जाकर उन सिला को बीनते थे। जिससे उनका दो चार माह तक पेट भरने का काम चल जाता था। इसी प्रकार खेतों में पड़े दानों से पशु पक्षियों को भी आहार मिल जाता था। लेकिन कृषि के आधुनिकीकरण ने इन सब के मुंह से निवाला छीन लिया।

अब तो हार्वेस्टर की कटाई के चलते न तो अंजुरी प्रथा ही रह गई है और न ही सिला बीनने की प्रथा। उसमें में भी कोढ़ में खाज यह कि हार्वेस्टर से फसल कटने के बाद खेत को जला दिया जाता है। जिससे प्रदूषण तो होता ही है साथ मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीव जो फसलों को किसी न किसी प्रकार से लाभ पहुंचाते हैं, वह भी भीषण दावानल में झुलस कर समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में कृषि फायदे का सौदा साबित हो भी तो कैसे।

इसी प्रकार प्रगतिशील कृषक कृपाशंकर खत्री, संजू खत्री, विनय माहेश्वरी आदि बताते हैं कि जबसे पश्चिम का अनुकरण कर रासायनिक खेती करना प्रारंभ हुआ है। शुरू में तो किसानों को काफी लाभ हुआ। लेकिन समय के साथ-साथ रासायनिक खादों आदि ने खेतों को बंजर भी बनाना शुरू कर दिया। वहीं, जो पश्चिमी देश पहले रासायनिक उर्वरकों के गुण गाते नजर आते थे। उन्होंने तो जैविक खेती अपनाना शुरू कर दिया। लेकिन हमारे यहां का किसान अभी भी रासायनिक खेती का गुण गाता नजर आता है। हमारे यहां के किसानों को भी चाहिए कि जैविक खेती को अपनाना शुरू करें। तभी किसानों का विकास संभव होगा।

रिपोर्ट- अनुराग श्रीवास्तव

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