प्रथम चरण के चुनाव से ठीक पहले सामने आया सपा सरकार का एक बड़ा घोटाला

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चुनाव के साथ-साथ सपा की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही चुनाव की घोषणा से पूर्व ही सपा में अंतर्कलह चली जो कि चुनाव के आते आते शांत ही हो पाई थी की समाजवादी सरकार में 1 बड़े घोटाले की बात और सामने आ रही है इस घोटाले में सपा के एमएलसी और वरिष्ठ नेता बुक्कल नवाब का नाम सामने आ रहा है बुक्कल नवाब पर आरोप है इन्होंने कि गोमती नदी की जमीन को अपनी निजी संपत्ति बताकर करोड़ों का मुआवजा हड़प लिया वहीं मामले की जांच के लिए दिए गए आदेशों को भी अफसरो ने सत्ता बता दिया | क्या है पूरा मामला गोमती नदी के जुड़ी जमीनों के बड़े हिस्से को एमएलसी बुक्कल नवाब ने अपनी निजी संपत्ति बताकर सरकारी खजाने से करोड़ों का मुआवजा हासिल कर लिया तथा इस मुआवजे को बिना किसी जांच के अफसरों ने एमएलसी बुक्कल नवाब के हवाले कर दिया |

इस मामले की सीबीआई जांच के लिए हरीश चंद्र वर्मा ने एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दायर की थी एवं इसी में द्वितीय गोमती बैराज में ला मार्टीनियर तक जमीन पर क्लेम करने के लिए अधिग्रहित की जा रही जमीन का भी मामला उठाया गया था | याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनु सिंह ने कहा कि 12 अक्टूबर 2015 के डीएम के आदेश के अनुसार जियामऊ, जुगौली और भिकमामऊ में कुछ गैर अधिग्रहीत जमीनों के लिए भी मुआवजा दिया जा रहा है।इसके तहत 54 बीघा जमीन के 28 भूखंडों को चुना गया जबकि यह भूमि शहरी निकाय में आती है उन्होंने कहा फर्जी दस्तावेजों के जरिए इन जमीनों को निजी संपत्ति बताया जा रहा है क्योंकि 1977 के जिस निर्णय का हवाला देकर यह जमीन ए बुक कल की बताई जा रही है वैसा कोई केस ही अदालत में कभी नहीं आया एवं यह जमीन गोमती नदी में डूबी रहती थी ऐसे में कोई व्यक्ति इस पर व्यक्तिगत दावा कैसे कर सकता है | बुक्कल नवाब ने भी 2011 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी जिसे खारिज कर दिया गया 2015 में फिर से याचिका दायर की जो अभी भी लंबित है| हाई कोर्ट ने पिछले साल अक्टूबर में निर्णय दिया– हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पिछले साल 26 अक्टूबर को एक निर्णय दिया की m.a. खान उर्फ बुक्कल नवाब की भूमि पर दावे की जांच किसी सरकारी अधिकारी ने नहीं की है | उन्हें मुआवजा क्यों मिलना चाहिए इसकी भी जांच नहीं की गई ऐसे में मामले की जांच गहराई से की जानी चाहिए और मुआवजे की रिकवरी नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारी से ही वसूली होनी चाहिए |

10 दिनों के भीतर हाई पर कमेटी का गठन —

सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार 10 दिनों के अंदर हाईपर कमेटी का गठन करना जरूरी है| कमेटी में राजस्व के विशेष सचिव स्तर के अधिकारी विधि विभाग के अधिकारी व अन्य अधिकारियों को शामिल किया जाएगा जो 3 महीने में अपनी रिपोर्ट देंगे परंतु इस आदेश के पालन को लेकर अधिकारियों के कानों पर जूं तक ना रहेगी बुक्कल नवाब के सत्ता में रसों के चलते अन्य अफसर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे| 30 जनवरी को वापस से हुई सुनवाई -इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राकेश श्रीवास्तव की बेंच ने की उनके संज्ञान में अफसरों की हीलाहवाली का मुद्दा लाया गया।

अदालत ने सख्ती जताते हुए कहा कि जिम्मेदार अफसर खुद हलफनामा देकर बताएं कि क्यों समय पर कमेटी नहीं बनाई जा सकी। -वे ये भी बताएं कि हाईकोर्ट के आदेश का जानबूझकर पालन नहीं करने के लिए उन पर अवमानना का केस क्यों नहीं चलाया जाए। मुख्य सचिव को 2 फरवरी तक हलफनामे देने थे -यह हलफनामे मुख्य सचिव और संबंधित अफसरों को दो फरवरी तक देने थे,लेकिन मुख्य सचिव राहुल भटनागर की तरफ से लीपापोती करते हुए कागजों में दर्ज एक कमेटी की जानकारी दी गई। -जिसके बाद अदालत को पता चला कि इस कमेटी के चेयरमैन जयप्रकाश सागर चौदह जनवरी को पंजाब चुनाव मे आब्जर्वर बनकर चले गए है। -अब अदालत ने गलत हलफनामे को लेकर मुख्य सचिव से जवाब तलब किया है कि क्यों न उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत मामला चलाया जाए। -बता दे कि अब इस मामले में अगली सुनवाई सात फरवरी को दोपहर 3.45 बजे नियत की गई है।

रिपोर्ट – दीपक मिश्रा

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