पर्यावरण संरक्षण में दुनिया की सबसे बड़ी कुर्बानी, 350 से भी अधिक लोगों ने दी थी अपनी जान

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जोधपुर- किसी रेगिस्तान में पेड़ का क्या महत्व होता है यह बात राजस्थान के लोगों से बेहतर किसी और को क्या पता होगा। आपको बता दें कि इसी राजस्थान के जोधपुर में कल पेड़ बचाने के प्रयास में जुटी एक महिला को कुछ दबंगों ने पेट्रोल छिड़क कर जला दिया। इस पूरे घटना क्रम में अधिक जलने की वजह से इस महिला की जान चली गई।

जिस महिला के ऊपर पेट्रोल छिड़ककर उसी के गांव के कुछ दबंगों ने उसे आग के हवाले कर दिया, उस महिला का नाम ललिता बताया जा रहा है। महिला ने अपने प्राण त्याग दिए लेकिन उसने इतिहास के उन पन्नों को एक बार फिर से पलट दिया है जो 230 साल पहले हुई इसी तरह की एक घटना की याद दिलाते हैं।

आपको बता दें कि आज से 230 साल पहले भी इसी तरह की एक घटना को अंजाम दिया गया था। तब रेगिस्तान का कल्पवृक्ष कहे जाने वाले प्रसिद्ध खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए एक महिला के नेतृत्व में पेड़ों से चिपके हुए 363 लोगों को एक राजा के कुछ सैनिकों ने काट डाला था। आज भले ही 363 नहीं अपितु एक महिला को काट कर ना सही तो जला कर उसी खेजड़ी के पेड़ की रक्षा करने के कारण मार दिया गया। दरअसल आपको बता कि जोधपुर के बोरुंदा थाना क्षेत्र में कल सुबह अपने खेत में लगे पेड़ों को काटने का विरोध करने पर ललिता नाम की एक महिला को गांव के ही कुछ दबंगों ने पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी जिससे वह महिला बुरी तरह से जल गई और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

इतिहास की किस कहानी की याद दिला गयी ललिता –
आपको बता दें कि यह घटना सन 1787 की है जब मारवाड़ आज के जोधपुर में महाराजा अभयसिंह का रास्ता उस समय विश्व प्रसिद्ध मेहरानगढ फोर्ट के फूल महल के निर्माण के लिए राजा को लकड़ियों की आवश्यकता पड़ी थी ऐसे में महाराज के लोगों की निगाह शहर से तकरीबन 24 किलोमीटर दूर स्थित खेजडली गांव के सैकड़ों खिचड़ी के पेड़ों पर पड़ी थी मारवाड़ के महाराज के नाम पर पेड़ काटने पहुंचे लोगों ने सबसे पहले अमृता देवी के खेत पर लगे पेड़ों को काटने का प्रयास किया अमृता देवी ने उसका जमकर विरोध किया लेकिन वह लोग नहीं माने और जब हम लोगों में फ्रेंड को पुनः काटने का प्रयास किया तो अमृतादेवी हार कर उस पेड़ से चिपक गई जिसके बाद राजा के कारिंदों ने अमृता देवी को भी उस पेड़ के साथ काट डाला अमृता को कटता देख उनकी तीन बेटियों ने भी अलग-अलग पेड़ों के साथ चिपक कर अपनी जान दे दी इन तीनों ही मां बेटियों के इस तरह से ट्रेनों के साथ चिपके हुए कटे जाने के बाद गांव के तकरीबन 363 लोग अलग-अलग पेड़ों से चिपक गए राजा की कारिंदों का तब भी दिल नहीं पसीजा और उन्होंने एक एक कर इन सभी 363 लोगों को मौत के घाट उतार दिया पेड़ों से चिपके हुए इन लोगों को काटते हुए राजा के लोगों ने सभी 363 पेड़ों को भी काट डाला।

बता दें कि जिन 363 लोगों ने राजस्थान के इन रेगिस्तानों का कल्पव्रक्ष किए जाने वाले खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था उनमें बिश्नोई समाज की 70 महिलाएं तथा 292 पुरुष शामिल थे महाराजा को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने तुरंत पेड़ों को काटना बंद करा दिया साथ ही उन्होंने विश्नोई समाज से माफी मांगते हुए आदेश जारी किया कि मारवाड़ की धरती पर कभी भी खिचड़ी के वृक्षों को नहीं काटा जाएगा और आपको बता दें कि तब से लेकर आज तक पूरे मारवाड में यह प्रथा सी रही है कि खेजड़ी के वृक्षों को कभी भी काटा नहीं जाता है पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा आंदोलन था जहां पेड़ों को बचाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने अपना बलिदान दिया है | इस स्थान पर आज भी हर वर्ष मेला लगता है जिसमें विश्नोई समाज के लोगों के अलावा अन्य समुदायों के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं तथा पर्यावरण के उन रक्षकों को नमन करते हैं | जहां पर इन लोगों ने बलिदान दिया उनकी याद में यहां पर एक बहुत बड़ा स्मारक बनाया गया है जो लोग इस मेले में आते हैं वह इस स्मारक का दर्शन करते हैं तथा इसकी प्रदक्षिणा करते हैं और उस सबाह समाधि स्थल का नमन करते हैं जहां पर इन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।

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