आतंकवाद की काली छाया, जिहाद या अपराध

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आतंकवाद नाम से ही समझ आता है यह क्या है और इसका विस्तार कैसे हुआ होगा ,अनवरत सम्पूर्ण विश्व में यह कैसे अपना क़हर बरपा रहा है इसकी व्याख्या ना की जा सकती है और ना ही इसका निवारण सम्भव प्रतीत होता है । शिवाय इसके विरोध के जो कि पूर्ण रूप से हो नहीं पाता , घटनाए हो जाती हैं जिसका ख़ामियाज़ा निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ता है ।इसका प्रत्यक्ष साक्ष्य हमें फ़्रान्स के नीस शहर में हुए आतंकी हमले से मिल सकता है।दहशतगर्द अपनी बिना उद्देश्य की आकांक्षाओं के लिए कहीं भी अपना वहशीपन दिखाने में पीछे नई हट रहे हैं।मेरा यहाँ वहशीपन शब्द इस्तेमाल करने का तात्पर्य उनके इस्तेमाल किए तरीक़ों से है जो उनकी निर्मम सोच और तानाशाही प्रवृति को दर्शाता है ।तानाशाह भी अपने तरीक़ों का इस्तेमाल इतनी निर्ममता से नहीं करते परंतु जहाँ आतंकवाद की बात आती है वहाँ सब व्यर्थ रह जाता है सारी टिप्पणी, सारी इंसानियत।
फ़्रान्स के राष्ट्रीय दिवस पर नीस शहर में हुए भयावह आतंकी हमले ने यह दिखा दिया है तमाम चौकसी के बाद आतंकी और उसके साथ फैलते हुए आतंकवाद को रोक पाना मुश्किल होता जा रहा है | यह अत्यंत दुखद है इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता कि बीते 18 माह में दो बड़े आतंकी हमले झेल चुके हैं । फ़्रान्स में राष्ट्रीय दिवस पर व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गयी होगी ,लेकिन दुर्भाग्यवश वह नाकाम सिद्ध हुई ।ऐसी नाकामी यूरोप के देशों में देखने को पहले भी मिल चुकी है।इसका एक कारण तो यह है की आतंकी हमले के लिए नए नए तरीक़ों का इस्तेमाल कर रहें लेकिन आश्चर्य तब होता जब यह बात सामने आती है कि हमलावर ऐसा भी हो सकता है जिसका सीधा सम्बंध आतंकी संगठन से ना हो । अभी हाल ही में अमेरिका के ऑर्लैंडो में इस्लामिक स्टेट से प्रेरित एक ऐसे ही आतंकी ने दर्जनों लोगों को गोलियों से भून डाला था । नीस में भी ट्रक के ज़रिए हुए हमले के बारे में यही अंदेशा है कि वह भी इस्लामिक स्टेट से प्रेरित आतंकी हो सकता है जिसे अपनी जान की चिंता ना होते हए ८० से ज़्यादा लोगों को ट्रक से रौंद डाला।इसके पहले पेरिस में 130 लोगों ने अपनी जान गँवायीं थी।यह विचित्र है कि इस्लामिक स्टेट इराक़ और सीरिया में अपनी ज़मीन खोता जा रहा है,लेकिन उससे प्रेरित आतंकी अन्य देशों में हमला करने में सफल हैं।हाल के दिनों में ब्रिशेल्स,इस्तांबुल ,ढाका और अब नीस में हुए भीषण आतंकी हमले यही बता रहे हैं कि इस आतंकी संगठन का विषैलापन किस क़दर इस विश्व को जकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा है

ऐसा मालूम पड़ता है कि दुनिया का कोई भी देश आतंकी हमले का कभी भी निशाना बन सकता है।आत्मघाती हमलावर विस्फोटकों या आटोमैटिक राइफ़लों या अकेले ख़ूँख़ार भेड़िए की तरह ट्रक से मासूमों को कुचलने का काम कर रहे रहे हैं।ऊपर ज़िक्र किए गए देशों पर हुए हमलों के बाद ऐसी लीपापोथी सम्भव नहीं की आतंक का कोई धर्म नहीं होता ।अब यह बात एकदम इस्पष्ट हो चुकी है कि जानलेवा महामारी की तरह जिस कट्टरपंथ का शिकार दुनियाभर के मासूम लोग हो रहे हैं उसके लिए समान रूप से सारे धर्म ज़िम्मेदार नहीं।
जब तक अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन का सफ़ाया नहीं किया तब तक बग़दादी की हस्ती नहर ही नहीं आती थी। यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए के अलक़ायदा की ज़हरीली बेल भी साउदीअरब ने ही बोई थी ।इराक़ हो या सीरिया , सुडान या यमन लगभग पूरे मध्यपूर्व में यही यही कट्टरपंथी इस्लामी तबक़ा रक्तपात के लिए जिम्मेदार है । तर्क यह भी दिया जा सकता है कि धर्मयुद्ध का एलान तो 9/11 के बाद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने किया था,लेकिन इसे भुलाया नी जा सकता कि वह एक भीषण हमले के बाद की प्रतिक्रिया थी ।
आज कश्मीर घाटी में जो कुछ हम झेल रहें हैं वहाँ मानवता की बात करना तो एक पत्थर से बात करने जैसा होगा ।यहाँ पर यह ज़रूर मालूम होना चाहिए की कश्मीर में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं फिर आतंकी घटनाएँ पनपने का सवाल कैसे खड़ा हो जाता है क्या वहाँ के लोगों को वो सुविधा नहीं मिलती जो हमेशा कश्मीर अलग करने की माँग करते हैं । ऐसा करने वाले भी सिर्फ़ नाम मात्र के हैं मुख्य जड़ें तो कहीं और से निकल के अपनी छाया फैलाने की कोशिश में हैं ,आतंकवाद की राजनीति यही कह सकते हैं।फिरवह चाहे ढाका के रेस्टोरेंट की निर्मम घटना क्यूँ ना हो जिसमें मासूमों को शिकार बनाया ,उन्ही को क्यूँ जिन्हें क़ुरान की आयात याद नहीं थी उन्हें क्यूँ नहीं जो और लोग भी थे अन्दर? ये आतंकी घटना किस धर्म को बयान करती है ।
कुछ विश्लेशक यह कहते हैं की इस्लामी जगत तो सदियों से शिया-सुन्नी की हिंसक रस्साकसी में फँसा है और उसी का लावा हिंसा ,निर्दोषों का ख़ून बहाकर आपसी रंजस ख़त्म करने का प्रयास ।पर ये तो इतना बृहद हो जाता है कि दो समूहों की लड़ाई से परे होता है ,जो आतंकवाद को दर्शाता है फिर सारे तर्क धरे रह जाते हैं ।फिर ऐसा क्यूँ होता है कि आपसी रंजिस मासूमों के रक्त से रंग जाती है ,कहीं ये तर्क सही होते हैं और कहीं पे इनका दूर दूर तक किसी धर्म और जाति से सम्बंध नहीं होता है।इसका साक्ष्य मुंबई में हुए सीरीयल ब्लास्ट से लिया जा सकता है,जो आतंकवाद की चरम पर नजर आता है ।ना कोई धर्म ना कोई जाति फिर इस आतंकवाद के लिए हम किसको ज़िम्मेदार माने।

लेखक – आशीष सिंह

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