भारतीय सैनिकों की बहादुरी पर कविता

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नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं।
दुश्मन को घुसकर के मारा, शान बड़ा कर आये हैं।I
मोदी जी अब मान गये हम, छप्पन इंची सीना है।
कुचल, मसल दो उन सब को अब, चैन जिन्होंने छीना है।I
और आस अब बड़ी वतन की, अरमान बड़ा कर आये हैं।
नाज हमें है उन वीरों पर, जो शान बड़ा कर आये हैं।I
एक मरा तो सौ मारेंगे, अब रीत यही बन जाने दो।
लहू का बदला सिर्फ लहू है, अब गीत यही बन जाने दो।I
गिन ले लाशें दुश्मन जाकर, शमसान बड़ा कर आये हैं।
नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं।I
अब बारी उन गद्दारों की, जो घर के होकर डसते हैं।
भारत की मिट्टी का खाते, मगर उसी पर हँसते हैं।I
उनको भी चुन चुन मारेंगे, ऐलान बड़ा कर आये हैं।
नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं।I

3 COMMENTS

  1. मेरे द्वारा लिखी यह छोटी सी कविता पसंद आए तो जरूर बताना……

    तूफानों से डटे रहे जो, उनको शीश झुकाता हूं, पाकिस्तान विरोधी नारे, अब मैं जग मे लगाता हूं ।

    उन की इस कुर्बानी से ही, खुली सांस ले पाते हैं,
    उनके सीने में फिर भी, छुरे घोंपे जाते हैं ।

    नित नित उनके बलिदानों पर, मैं भी मर मर जाता हूं,
    तूफानों से डटे रहे जो, उनको शीश झुकाता हूं ।

    पूछ रही है भारत माता, नेताओं की टोली से ,
    कितने वीर जवान खेलेंगे, अभी खून की होली से ।

    कर्म पथ के में अनुरागी, गीत यही अब गाता हूं ,
    तूफानों से डटे रहे जो, उनको शीश झुकाता हूं।

    गीदड़ और गद्दारों में क्या, फर्क नहीं हम पाते हैं,
    गीदड़ से लड़ने में भी, अब शेर शहीद हो जाते हैं।

    आक्रामक हो देश की हालत, अब सब को बतलाता हूं, तूफानों से डटे रहे जो, उनको शीश झुकाता हूं।

    पठानकोट पंपोर नौहट्टा पूंछ और अब उरी है,
    कितने हमले होने हैं दिल्ली की बस कुछ दूरी है।

    हमलो की निंदा में भी अब, ना श्रद्धा दे पाता हूं, तूफानों से डटे रहे जो उनको शीश झुकाता हूं।

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