नागरिकों को उनका अधिकार प्रदान कर अपनी व सरकार की  पीठ थपथपा रहे जनप्रतिनिधि

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महराजगंज/रायबरेली (ब्यूरो) देश की आजादी को आज लगभग 70 वर्ष होने को हैं लेकिन देश कि राजतंत्र वाली शासन व्यवस्था आज भी कायम नजर आती है । यह सोचकर बड़ा अफसोस हो रहा है कि आज देश में किसी जीवित व्यक्ति के अधिकारों की बात करने वाला कोई नहीं है जबकि किसी व्यक्ति के मरने के बाद उस को मिलने वाली आर्थिक सहायता के नाम पर नेता अपनी व अपनी सरकार की पीठ थपथपाने से नहीं बाज आते हैं और पीड़ित व्यक्ति के परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के नाम पर अपनी छवि को चमकाने और खुद को महिमामंडित करने से भी नहीं चूकते हैं |

अभी हाल में हुये घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक पुजारी की हत्या के मामले में आप लोगों ने देखा कि मृतक पुजारी के अधिकारों को लेकर दो जनप्रतिनिधि किस प्रकार आमने-सामने खड़े नजर आए और वह पीडित परिवार को मिलने वाली सहायता के लिए किस प्रकार एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे थे । मुझे यह सोचकर बड़ा अफसोस हो रहा है कि एक लोकतांत्रिक देश में अपने अधिकारों के लिए जनता को यह दिन देखना पड़ रहा है । सरकार को चुनने वाली कोई और नही बल्कि यह जनता ही है और जनता के खून पसीने की कमाई का एक हिस्सा टैक्स के रुप में सरकारी राजकोष में जाता है जो वास्तव में जनता के उपयोग के लिए ही बना होता है । जिस पर जनता का पूरा अधिकार होता है । वही जनता के इस अधिकार के लिए कोई कहे कि ये अधिकार मैंने या मेरी सरकार ने जनता को प्रदान किया तो हंसी जरूर आती है । यदि ये जनप्रतिनिधि अपनी जेब का पैसा किसी गरीब जनता की सहायता के लिए खर्च करते होते तो शायद आज मध्यम परिवार से ताल्लुक रखने वाले यह जनप्रतिनिधि अकूत संपत्ति के मालिक ना होते बल्कि एक साधारण व्यक्ति के समान होते । वास्तव में अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए होने वाली राजनीति कोई समाज सेवा नहीं बल्कि एक दिखावा है ।

आज जीवित व्यक्ति के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार संबंधी मौलिक अधिकारों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है । लाखों युवा बेरोजगार घूम रहे हैं । मुझे लगता है उनके अधिकारों की भी बात सबसे पहले होनी चाहिए । यदि व्यक्ति अपने अधिकारों को प्राप्त कर लेगा तो वह इतना सक्षम व आत्म निर्भर हो जायेगा कि शायद उसके न रहने पर उसके परिवार को ये दिन देखना नही पड़ेगा ।

रिपोर्ट -विनय सिंह चौहान

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