हार की समीक्षा में जुटे प्रत्याशी, दलीय निष्ठा हुई तार तार

0
72

बरसठी जौनपुर- विधान सभा का चुनाव बीत गया, परिणाम भी जनता के सामने आ गया। ऐसे में चुनाव हार चुकी भाजपा और बसपा के प्रत्याशी अपनी-अपनी हार की समिक्षा में जुट गये हैं। समीक्षा के दौरान कार्यकर्ताओं और सपोर्टरों के बीच से जो बात छनकर आ रही है, वह चौकाने वाली है। भाजपा से अनीता रावत मात्र पैतिस सौ मतों से पिछण कर चुनाव हार गयी हैं, तो वही चुनाव से एक सप्ताह पूर्व तक सभी पर भारी पड़ती दिखाई पड़ रही बसपा का तीसरे नंबर जाना आश्चर्य से कम नहीं। हारे हुए चुनाव को जीत में बदलने का माहिर सपा प्रत्याशी जगदीश सोनकर के रण कौशल को क्षेत्र के राजनैतिक दिग्गज तथा मठाधीश भी लोहा मान रहे है। भाजपा और बसपा को अपने ही दल के कद्दावर नेताओं के कारण हार का सामना करना पड़ा है ।

भाजपा प्रत्याशी की हार मछली शहर के भाजपा कार्यकर्ताओं को चुनाव के ऐन वक्त दो गुटों मे बंटना बताया जा रहा है। छनकर आ रही खबरों की माने तो अरुआवां में भाजपा कार्यकर्ता सम्मेलन में भाजपा कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों द्वारा वर्तमान भाजपा सांसद के खिलाफ की गयी नारे बाजी का परिणाम भाजपा प्रत्याशी को हार के रुप में मिली । सूत्रों की मानें तो भाजपा प्रत्याशी को हराने की पटकथा अरुआवां के कार्यकर्ता सम्मेलन में ही लिखी जा चुकी थी। जिसे भाजपा प्रत्याशी समझ नहीं पायी और परिणाम सबके सामने है। जबकि अरुआवां कार्यकर्ता सम्मेलन मे जो कुछ हुआ था ,वह सांसद के प्रति कार्यकर्ताओं तथा वोटरों का आक्रोश था ,जिसके जिम्मेदार स्वयं सांसद है ।चुनाव जीतने के बाद कभी भी कार्यकर्ताओं के बीच आये ही नही और न कभी क्षेत्र की जनता की खोज खबर ही लेते हैं। मछली शहर का दुर्भाग्य ही है कि जब केन्द्र मे बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार आयी तो विधायक दुसरे दल का हुआ। सांसद और विधायक दोनों के पास विगत तीन वर्षों से मछलीशहर की जनता को विकास न करा पाने का इससे बढ़िया कोई दूसरा बहाना भी क्या हो सकता है कि हम तो विकास कराना चाहते हैं लेकिन हमें विधायक या विधायक को दूसरी पार्टी के सांसद का सहयोग नहीं मिल पा रहाहै। बात करते हैं बसपा की तो इस पार्टी मे भी जबर्दस्त भीतर घात हुआ है ।बसपा के कैडर वोटर को चुनाव के दो तीन पहले क्षेत्र मे यह कहते सुना जाने लगा की जब पिछली बार बसपा से हमारे बिरादरी का प्रत्याशी खड़ा था तो पासी बिरादरी के लोग अपना मत नही दिये तो हम पासी बिरादरी के प्रत्याशी को वोट करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

ऐसी स्थिति मे प्रश्न यह उठता है की चुनाव से ठीक तीन चार दिन पहले यह बात बसपा के परम्परागत हरिजन मतदाताओं के बीच वह कौन लोग थे, जो फैलाने का कार्य किये । बसपा प्रत्याशी के पक्ष मे जो अन्य सवर्ण या अन्य गैर सपाई पीछड़ी जातियों का झुकाव था वह धीरे धीरे काफी हद तक बसपा से छीटक गया। कुछ तो बसपा के सक्रिय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी बसपा प्रत्याशी पर भारी पड़ी। बसपा को पिछड़ता देख जो मुस्लिम मतदाता बसपा के समर्थनमें था, वह इस डर से बसपा छोड़ सपा की तरफ मुखातिब हो गया कि कहीं बसपा के साथ रहने से भाजपा न जीत जाये और यही बात भाजपाई समझ नहीं पाये और जीती हुई सीट भाजपा हार गयी। इसे सपा प्रत्याशी का रण कौशल कह लिजिए या भाजपा और बसपा के रण बाकरों की चालाकी । दोनों तरफ से भविष्य के कांटे को निकाल बाहर करने की खुबसुरत चाल। लेकिन शर्मनाक दोनों दलों (भाजपा, बसपा) के लिए है । जिसे दोनों पार्टियों के संगठन मे उच्च पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों को मंथन और चिन्हित कर ऐसे पदाधिकारी या कार्यकर्ताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। लोकतंत्र मे जीत हार होती रहती है लेकिन जब अपने ही दल के लोग दलिय निष्ठा को तार तार करते हैं तो निश्चित रुप से ऐसे दलों का भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता। समय रहते ऐसे छोटे बड़े बन रहे नासूरों आपरेशन और इलाज जरूरी हो जाता है।

रिपोर्ट- डॉ. अमित कुमार पाण्डेय

हिंदी समाचार- से जुड़े अन्य अपडेट लगातार प्राप्त करने के लिए लाइक करें हमारा फेसबुक पेज और आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं |

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY