जब नरेंद्र मात्र छह वर्ष के थे …!!

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जब नरेंद्र मात्र छह वर्ष की उम्र के थे, अपने साथियों के साथ चैत संक्रांति के समय होने वाले शिव पूजनोत्सव देखने गए, पूरा दिन वहां पर भ्रमण करने के पश्चात जब वह वापस आने लगे तो वापस आते समय उन्होंने उस शिव स्थान से एक मिटटी के महादेव की मूर्ति को खरीदकर ले जाना उचित समझा और मूर्ति लेकर वह साथी के साथ घर की ओर चले I

स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद

घर लौटते समय काफी अन्धकार हो चुका था और उनका साथी भी काफी पीछे छूट गया था I उसी समय एक घोडा गाडी तेजी से पीछे से आ रही हैं जानकर नरेन् ने पीछे मुड़कर देखा कि साथी बिलकुल घोड़े के पैर के नीचे पड़ने ही वाला हैं और क्या ! रास्ते के लोग चीत्कार उठे, “गया, गया !” किन्तु किसी ने भी प्रतिकार का उपाय नहीं किया या फिर कहे कि कोई कर नहीं सका I इधर नरेन ने महादेव की मूर्ति को बाई बगल में रखकर बहुत तेजी से दौड़कर और अपने साथी का हाथ पकड़कर अपनी ओर खीचते हुए मानों उसे बिलकुल घोड़े के पैरों  नीचे से ही निकाला हो, बाहर निकाल बचा लिया I

क्षण भर के अन्दर ही यह अपूर्व घटना घट गयी एवं उपस्थित सारे लोग बालक नरेंद्र नाथ को साधुवाद (आशीर्वाद) देने लगे I नरेंद्र ने उन सब बातों पर ध्यान न देते हुए अपने घर लौट आये तथा माँ से जिस प्रकार नित्य सारी बातें कहा करते थे उसी प्रकार यह घटना भी सुना दी I

माँ ने शरू से आखिरी तक सुनकर आशीर्वाद देते हुए कहा, “बच्चा, यही तो मनुष्य की तरह का कार्य हैं ! सर्वदा इसी प्रकार मनुष्य होने की चेष्टा करना I

(विवेकानंद चरित)

उस समय उस छोटे से बालक को आशीर्वाद देने वालों क्या पता था कि एक दिन यही बालक पूरी दुनिया को अपने ज्ञान और प्रकाश से आशीर्वाद देकर अनुग्रहित करेगा ! बड़े होने पर यही नरेंद्र नाथ दत्त, स्वामी विवेकानंद बने ….

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