डिजिटल इंडिया के युग में बदहाली के दौर से गुजर रहे छोटे शहरों के सिनेमाहाल

कुशीनगर (ब्यूरो) दशकों पूर्व मनोरंजन के एक मात्र साधन सिनेमाहाल बदहाली की दौर से गुजर रहे हैं। संचार क्रांति में आए बदलाव ने सिनेमाहालों से जुड़े लोगों की रोजी-रोटी छीन ली। यही कारण है कि जनपद में दो दशक पूर्व 17 सिनेमाहालों की संख्या घटकर 10 पहुंच गई है। अब पडरौना में एक, खड्डा में दो, रामकोला में एक, कप्तानगंज में एक, कसया में एक, फाजिलनगर में दो, सेवरही में दो सिनेमा हाल संचालित है। कुशीनगर जनपद में दो दशक पूर्व सिनेमाहालों की रौनक इतनी थी कि हर शो में भीड़ ही दिखती थी, उस समय पहला शो देखने के लिए टिकट के लिए लोग लाइन में लगाते, तो पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ता था। नई फिल्म का पहला व दूसरा शो हाउस फुल जाता था। लेकिन सेटेलाइट युग में धीरे-धीरे सिनेमाहालों की ओर दर्शकों का रूझान कम हुआ, तो सिनेमाहाल बंद होते गए। कभी प्रति वर्ष करोड़ों रुपये राजस्व वसूली करने वाले मनोरंजन कर विभाग की आय भी घट गई। पहले सिनेमा हाल में मैनेजर समेत गेटकीपर आदि दर्जनों लोगों की आजीविका चलती थी, तो प्रोजेक्टर चलाने के लिए आपरेटर भी रहते थे। सिनेमा जगत को प्रोत्साहित करने की दिशा में सरकार कोई कार्य नहीं कर रही है। पहले सिनेमा हालों में फिल्म रिलीज होने पर सीट के अनुसार 500 से 600 के बीच में दर्शक बैठते थे, जो अब सौ से डेढ़ सौ के बीच पहुंच गई, तो दूसरे में शो में 20 से 50 दर्शक ही आते हैं।

एक सिनेमा हाल के मैनेजर वेद प्रकाश चौबे कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों में नाइट शो दर्शक न आने के कारण बंद ही रहता है। तीसरा शो भी अक्सर बंद ही रहता है। कभी कभार नाइट शो चलाने का मौका मिलता है, जो महीने में कभी कभार ही आता है। जब सिनेमाहालों का बोलबाला था तो गेट कीपर से लेकर मैनेजर तक अच्छी कमाई करते थे, क्योंकि उस समय निर्धारित रेट दो गुना दर पर बेचते थे। इसके अलावा मानदेय सुरक्षित बच जाता था। पूर्व में मैनेजर विद्या, गणेश, गिरी बाबा, शंकर, बच्चा , राजेंद्र, नागेंद्र नसीम व बाबू कहते हैं कि सिनेमाहाल बंद होने से ऊपरी कमाई के साथ मानदेय भी खत्म हो गया। कोई घर खेती करा रहा है, तो मजदूरी कर रहा है। कसया में रिक्शा पर नए सिनेमा का प्रचार करने वाले राम प्रताप अब कबाड़ बीन कर रोजी रोटी चला रहे हैं। इनका कहना है कि सरकार ने सिनेमाहालों को व्यवसाय के रूप में प्रोत्साहित किया होता, तो शायद इतनी खराब स्थिति नहीं होती। वर्ष 1975 से लेकर 1985 तक 75 पैसे लेकर सवा दो रुपये की दर से फ‌र्स्ट क्लास का टिकट बिकता था। अब बालकनी 80 रुपये व नीचे का सीट 60 रुपये में बुक होता है। इलेक्ट्रानिक डिवाइस की सुविधा, डिश टीवी व मोबाइल पर आन लाइन सुविधा उपलब्ध होने के कारण घर बैठे ही अधिकतर दर्शक नई या पुरानी फिल्में देख लेते हैं, जिससे लगातार दर्शकों की संख्या कम होती गई। पिछले वित्तीय वर्ष में एक करोड़ रुपये सरकारी टैक्स जमा कराया गया। सिनेमा हाल की संख्या घटने के कारण अब वार्षिक लक्ष्य 84 लाख निर्धारित है। अप्रैल 2017 में 5.04 लाख, मई में 6.72 लाख, जून में 6.72 लाख राजस्व की वसूली हुई है। अधिकारी राजेश कुमार ¨सह कहते हैं कि संचार क्रांति की वजह से सिनेमाहालों में दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इससे निपटने के लिए ठोस पहल की जरूरत है, तभी सिनेमाहालों की रौनक लौटेगी।

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