गाथा परमवीर चक्र विजेताओं की – आज ही के दिन शहीद हुए थे शेर ये हिंदुस्तान कैप्टन विक्रम बत्रा

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परम वीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा
परम वीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा

“जीत गया तो चोटी पर तिरंगा फहराऊंगा और अगर मर गया तो उसी तिरंगे में लिपटा हुआ चला आऊंगा लेकिन आऊंगा जरूर” कैप्टन विक्रम बत्रा

देश की सुरक्षा में हमेशा से सैनिकों का इतिहास गौरवपूर्ण रहा हैं, किसी भी सैनिक का बलिदान कभी भी छोटा या फिर बड़ा नहीं होता हैं लेकिन फिर भी कभी-कभी हमारे सामने कुछ ऐसे बहादुर और निर्भीक सैनिक एक ऐसा उदहारण स्थापित कर जाते हैं कि जिसे सुनने मात्र से ही हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं और भुजाएं फड़कने लगती हैं I

ऐसे ही वीर सैनिक थे परमवीर चक्र विजेता शेरशाह के नाम से मशहूर कारगिल में दुश्मनों की दांत खट्टे करने वाले महावीर विक्रम बत्रा I

हिमांचल प्रदेश के पालमपुर निवासी जी.एल.बत्रा और कमलकांता बत्रा के यहाँ 9 सितम्बर 1974 को जन्मा था यह शेर, जुलाई 1996 में देहरादून मिलेट्री अकेडमी को ज्वाइन किया था और दिसंबर 1997 में अपनी शिक्षा को समाप्त कर सीधे पहुँच गए थे जम्मू के सोपोर इलाके में सेना के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में एक लेफिनेंट के तौर पर I और तभी से ही शुरू हो गयी थी वीरता और निर्भीकता के एक नए अध्याय की शुरुआत I

लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को युद्ध भूमि में ही उनकी एक के बाद एक मिलती सफलताओं के कारण उन्हें लेफ्टिनेंट से कैप्टन बना दिया गया था I

यहाँ आपके लिए यह जानना बहुत जरूरी हैं कि कैप्टन को कब कारगिल में दुश्मनों से लोहा लेने के लिए भेजा गया I तो हम आपको बता देतें हैं कि कैप्टन विक्रम बत्रा और उनके साथियों को 12 जून 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में दुश्मनों को जवाब देने और उन घुसपैठियों को भारत की भूमि से भगाने के लिए भेजा गया था I

जैसे ही कैप्टन अपनी टीम के साथ द्रास पहुंचे उन्हें मिशन दिया गया था कारगिल की ऊँची चोटी जिसे प्वाइंट 5104 को दुश्मन के हाथों से छीन कर लाने का I उसके बाद कैप्टन ने बहुत ही जल्द एक के बाद एक सभी चोटियों पर झंडा फहराते हुए अपने एक जख्मी साथी को बचाते हुए जय माता की दी कहते हुए भारत को हमारे हवाले कर गए I

कैप्टन बत्रा और उनके साथियों के लिए यह जीत आसान नहीं थी उन्होंने

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