व्यवस्था की गैर जिम्मेदारी से बच्चों के साथ विश्वास की भी मौत

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रायबरेली (ब्यूरो)- “रस्ते निहारती रही मांयें तमाम रात, अस्पताल के बच्चे सभी जन्नत चले गये।” आजादी के जश्न से ठीक पहले गोरखपुर के मेडिकल कालेज की ह्दय विदारक घटना ने ‘यह कैसी आजादी’ सोचने पर विवश कर दिया है? जिसे पाने के लिए मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारा हर जगह मत्था टेका, जिसको नौ महीनों तक बड़े लाड प्यार से कोख में रखा, जिस की प्राप्ति के समय असहनीय प्रसव पीड़ा भी हंसकर बर्दाश्त कर ली।

यदि उसकी जीवनलीला पलक झपकते ही समाप्त हो जाए तो उस मां का दर्द क्या होगा? शायद कोई नहीं समझ सकता। रोती बिलखती बदकिस्मत मां, गोरखपुर में जिनके बच्चों की मौत हुई वे अपनी सब्र की कोई गुंजाइश इसलिए नहीं तलाश कर पा रही हैं क्योंकि उन्हें धरती के भगवान से लाडले के ठीक होने की पूरी उम्मीद थी। सिस्टम की एक छोटी सी गलती से दर्जनों मांओं की उम्मीद आंसुओं के सैलाब में बह गई। नौनिहालों की मौत की जिम्मेदारों की आड़ में राजनीति शुरू है। जनता का विश्वास जीतकर सत्ता में आई भाजपा और योगी सरकार के घेराव की तैयारी है।

योगी से इस्तीफा मांगा जा चुका है। राजनीति करने वाले इन लोगों को मां की उजड़ी कोख और औलादहीन हो चुके पिता का दर्द भी नहीं सालता। गोरखपुर में जो कुछ भी हुआ उसका दर्द पूरे देश में झलक रहा है। वहां आंसुओं का सैलाब है तो जगह-जगह गमों का गुबार। एक-एक लम्हे की मेहनत से पाल-पोसकर तैयार की गयी औलाद एक लम्हे में खत्म। उस मां को यकीन नहीं हो रहा कि उसके सामने उसकी औलाद की लाश है।

लाशें कभी बोला नहीं करती, हंसती भी नहीं, रोती भी नहीं, न ही जिद करती हैं और न मां कहकर प्यार से गले लग जाती हैं। अब उन्हें सोने के लिए थपकी की भी जरूरत नहीं। हां, मां की थपकी जरूर ताउम्र तरसती रहेगी गोद में रखे किसी सिर को सहलाने के लिए। उस बाप का फौलादी सीना बच्चे की लाश उठाने के बाद कमजोर हो गया होगा। बाजू साथ नहीं दे रहे होंगे, कंधे झुक गये होंगे। अब न कोई किसी चीज की लालच में उसकी जेबें टटोलेगा, न गोदी में चढऩे को बेताब होगा और न ही फरमाइशें करेगा।

इस हादसे में केवल वह बच्चे ही नहीं मरे हैं वह घर भी मर गये, वह मां भी मर गयी, वह बाप भी मर गये और मर गयी वह इंसानियत भी जो इसके लिए जिम्मेदार है। मौत के कारणों पर सफाई देने वालों को समझना होगा कि गलती किसकी है, यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन मौतें तो व्यवस्था के गैर जिम्मेदार रुख से ही हुई हैं। मौत के पीछे ऑक्सीजन की कमी बताई जा रही है यदि ऐसा है तो यह सिर्फ बच्चों की मौत नहीं बल्कि सरकारी तंत्र पर आम जनता द्वारा किए गए विश्वास की मौत है।

दर्जनों बच्चों की जान चली गई। फिलहाल सरकार को चाहिए कि वह चेते और आम लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब हो। इन पंक्तियों के साथ इस कू्ररतम हादसे की कड़ी निन्दा और मांओं से बिछड़े बेटों को भावभीनी श्रद्धांजलि- “पता चलता है जब दर्द लेखनी पे उतरता है, हर्फों के बीच अपना ही कलेजा जलता है।

रिपोर्ट-अनुज अवस्थी

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