देशद्रोही यासिन मलिक और गिलानी के साथ मंच साझा करने वाली पर कैसे भरोशा करे भारत जनता ?

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भारत विरोधी कार्य करने वाले सैयद अली शाह गिलानी के साथ मंच साझा करती हुई अरुंधती रॉय
भारत विरोधी कार्य करने वाले सैयद अली शाह गिलानी के साथ मंच साझा करती हुई अरुंधती रॉय

आज एक और मशहूर लेखिका ने देश में जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के ऊपर असहिष्णुता को बढ़ावा या फिर बढ़ रही असहिष्णुता का आरोप लगाते हुए अपना नेशनल पुरस्कार वापस करने की घोषणा कर दी है I गौरतलब है कि मशहूर लेखिका अरुंधती राय ने आज केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन तथाकथित बुद्धिजिवियों का सहयोग करने का निश्चिय किया है जिन्होंने केंद्र सरकार के ऊपर देश अराजकता का माहौल फैलाने का आरोप लगाते हुए अपने अवार्ड्स वापस किये थे I

लेकिन आज जो लेखिका देश के भीतर बढ़ रहे अराजकता के माहौल या फिर असहिष्णुता की बात कर रही है उसी तथाकथित बुद्धिजीवी ने कभी भारत के खिलाफ भारत में ही रहकर आन्दोलन करने वाले सैयद अली शाह गिलानी और आतंकवादी से तथाकथित नेता बने यासिन मलिक के साथ मंच साझा करती हुई दिख चुकी है I

अब ऐसे लोगों को हम बुद्धिजीवी कैसे मान सकते है जो खुद देशद्रोहियों के साथ मंच साझा करती है I हम उन्हें देश की एकता और अखंडता का रक्षक कैसे मान ले जो उन देश द्रोहियों और हत्यारों की समर्थक रही है जिनके हाथ कश्मीरी पंडितों के खून से सने हुए I अब तो यह धीरे-धीरे साफ़ होता जा रहा है कि तथाकथित लेखकों के बयान और उनके द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कारों का वापस करना केवल और केवल एक राजनैतिक चाल ही है इसके अलावा और कुछ भी नहीं I

आतंकी से नेता बने यासिन मलिक से हाथ मिलाती हुई अरुंधती रॉय
आतंकी से नेता बने यासिन मलिक से हाथ मिलाती हुई अरुंधती रॉय

अगर इन्हें वापस ही करना था या फिर विरोध ही करना था तो इनलोगों ने यह तब क्यों नहीं किया जब कश्मीर में रह रहे लाखों कश्मीरी पंडितों को उनके घर से बेदखल कर दिया गया I इनका देश प्रेम तब क्यों नहीं जगा जब मात्र 3 दिन के भीतर ही हाजारों सिक्खों का पूरे देश में दिन दहाड़े कत्लेआम कर दिया गया I इनका समाज और देश की एकता अखंडता के प्रति प्रेम तब कहा चला गया था जब भोपाल गैस कांड के प्रमुख आरोपी को रातो-रात देश के बाहर निकाल दिया गया I इनका प्रेम तब कहा चला गया था जब देश के प्रधानमंत्री ने ही अनेकों हत्याओं के बाद कहा था कि जब कोई बड़ा पेंड गिरता है तो धरती तो हिलती है I

अगर तब नहीं तो आज फिर जब चारों ओर पूरी दुनिया में भारत अपने गौरव की तरफ बढ़ रहा है तब यह ऐसे प्रश्न क्यों उठा रहे है I अगर वापस ही करना था तो मुज्जफरनगर के दंगों में भी वापसी हो सकती थी I ऐसे अनेकों अनेक उदहारण भारत के इतिहास में दर्ज है जब ऐसे कदम उठाये जा सकते थे लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया तो आज ऐसा क्यों हो रहा है ? यह विचार करने का विषय है !

 

आइये विचार करिए क्योंकि इन तथाकथित बुद्धिजिवियों के एक पैर देश में तो दूसरा देश के बाहर रहता है इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा अगर फर्क किसी को पड़ेगा तो वह मुझे और आपको ! कौन सही है और कौन गलत इसका विचार केवल और केवल हमें और आपको करना है क्योंकि सरकार हमनें चुनी है इन्होने नहीं तो इस सरकार के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगाने का हक़ भी हमारे पास ही है इनके पास नहीं !

आइये इन्हें देते है जवाब –

धन्यवाद !

धर्मेन्द्र सिंह

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