बूढे़ बाबा व गौरींकरन जाने वाले भक्तों की हर मनोकामना होती है पूर्ण

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ऊंचाहार/रायबरेली(ब्यूरो)- तहसील क्षेत्र के गांव मिर्जापुर ऐहारी स्थिति बूढेबाबा व हमिदपुर बडागांव स्थित गौरींकरन का मंदिर अपने आप मे ऐतिहासिक है जिसकी इतिहास लेकिन किस्सों कहानियों मे ही तब्दील इसलिये है कि इसका कोई लिखित लेखाजोखा नही है। जहां पर आने वाले हर भक्तों की मुराद पूर्ण होती है|

जिला रायबरेली से 38 किलोमीटर दूर ऊंचाहार है, जहां से 12 किलोमीटर दूर बूढेबाबा मंदिर गांव मिर्जापुर ऐहारी मे है| यहां पर ऐसा मानना है कि कई दशक पूर्व यहां पर जंगल हुआ करता था, जहां पर मवेशियों के चरूहार लोग उसी जंगल मे अपनी मवेशी चरने के लिये डाल देते थे। जिस दौरान ही दूधारू मवेशी उसी जंगल मे अपने आप दूध गिरा देती थी जिसका अचंभा देखकर मवेशी स्वामियों ने गांव मे बताया जहां का झुंड जंगल मे पहुंचकर वहां पर झाडी हटवाया, जिस दौरान वहां पर पत्थर का शिवलिंग दिखा| जिसको ग्रामीणों ने खोदने की कोशिश जैसे-जैसे करते थे वैसे ही वैसे वह धरती के नीचे धंसता चला जाता था, जिसके चमत्कार से सब दंग रह गये और वहां पर उसी दौरान श्रमदान करते हुए ग्रामीणों ने चबूतरा बनवाया और इसी शिवलिंग को बूढेबाबा का दर्जा दिया गया| धीरे-धीरे उसके सौन्दर्यीकरण आसपास के ग्रामीणों के चंदे से किया गया है।

यहां के पूर्व प्रधान जगन्नाथ शुक्ला ने बताया कि यहां पर स्थायी पुजारी नही है न ही प्रसाद की दुकान न ही यहां पर आने जाने वालों के लिये कोई साधन है| सभी लोग अपने निजी वाहन से आते-जाते है। वहीं ऊंचाहार से 15 किलोमीटर दूर हमिदपुर बडागांव है जहां पर गौरींकरन मंदिर है जहां के ऐतिहासिक क्षणों मे यदि नजर डाले तो इस मंदिर के स्थल मे कई दशक पूर्व झाडी भरी बाग थी और उस बाग मे भुजवा बिरादरी के लोगों द्वारा पत्तियों का ढेर एकत्र करते थे, जिसी ढेर के पत्तियों की समाप्ति के दौरान वहां पर शिवलिंग दिखा, जिसकों लोगों ने पत्थर समझकर खजाना उसके नीचे गडे होने की आशंका से उसकी खुदाई आसपास पत्थर के नीचे तक पहुंचने के लिये जैसे जैसे किया गया वैसे ही वैसे शिवलिंग नीचे धंसता चला गया और उसके बाद वहां के लोगों ने दैवीय शक्ति मानकार वहां पर चबूतरा बनवाया गया, जिसके बाद धीरे-धीरे यहां पर पक्का चबूतरा बना दिया गया जो गौरींकर मंदिर के नाम से सुविख्यात हुआ। जहां की मन्नत ये भी है कि इस मंदिर के ऊपर कई बार छत डालवाने का प्रयोग किया गया लेकिन अपने आप वह छत ढह गया और जिसके कारण आज भी ये गौरींकरनमंदिर छत विहीन है। जहां पर भी स्थायी पुजारी कोई नही है इटैली निवासी शिक्षक प्रमोद पाण्डेय ने बताया कि मंदिर ऐतिहासिक है लेकिन यहां पर साधन आने-जाने वाला नही है न ही न ही प्रसाद की कोई दुकान है यहां पर आने वाले भक्तों को स्वयं के साधन से व प्रसाद खरीदकर बाहर से ही लाना पडता है। सावन माह मे प्रतिदिन यहां पर भक्तों का तांता लगा रहता है|

रिपोर्ट- अनुज मौर्य/सर्वेश

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