भारत से शुरू हुआ था महाविनाश

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daynasor

आप जानते है कि हमारी पृथ्वी पर पहले डायनासोर जैसे अनेकों विशालकाय जीव जंतु रहा करते थे जो अकेले ही पूरी की पूरी आबादी को तहस नहस करने में समर्थ थे | लेकिन क्या आप वास्तव में यह जानते है कि इनका विनाश कब और कहा से प्रारंभ हुआ था और ये अचानक से कैसे गायब हो गए थे | दरअसल आपको बता दें कि एक हिंदी वेबसाइट dw.com में छपी खबर के अनुसार इस महाविनाश की शुरुआत भारत से हुई थी और उसके बाद ब्रह्माण्ड से आये एक अन्य विशालकाय पिंड ने जो रहा सहा बचा था उसे भी ख़त्म कर दिया था |

एक ही झटके में नहीं ख़त्म हुए डायनासोर जैसे विशालकाय जीव –
आपकी जानकारी को और अधिक पुख्ता करते हुए हम आपको बता दें कि डायनासोर जैसे विशालकाय जीव अचानक से कभी समाप्त नहीं हुए थे | आजकी आधुनिक तकनीक के माध्यम से इस बात को वैज्ञानिक प्रमाणित कर रहे है | दरअसल बता दें कि वैज्ञानिकों का दावा है कि आज से तक़रीबन 6.6 करोंड साल पहले ब्रह्मांड से आये एक विशाल उल्कापिंड ने पूरी धरती को हिला कर रख दिया था | उल्का पिंड की धरती के साथ यह टक्कर इतनी भीषण थी की पूरी की पूरी धरती थर्रा गयी थी और इसके बाद धरती से जीवन समाप्त हो गया था | यह टक्कर जिस स्थान पर हुई थी वह स्थान आज मैक्सिको में आता है |

भारत से शुरू हुई थी महा विनाश की क्रिया –
गहन खोजो और शोधों के बाद मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है. इन जीवाश्मों में 65 लाख साल का इतिहास छुपा है | वैज्ञानिकों के मुताबिक पहले एक विशाल ज्वालामुखी फूटा. यह ज्वालामुखी मौजूदा भारत के दक्कन इलाके में था | इसे इतिहास का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट माना जाता है |

उस ज्वालामुखी ने हजारों साल तक विषैली गैसें और अरबों टन राख का गुबार छोड़ा | विस्फोट और गर्म लावे के चलते पहले समुद्र का तापमान बढ़कर 7.8 डिग्री सेल्सियस हो गया | इसके बाद राख का गुबार पूरे वायुमंडल में छा गया और धरती सूरज की रोशनी के लिए तरस गई | फिर तापमान गिरने लगा और हालात बर्फीले होने लगे | डायनासोर समेत 24 जीवों को परेशानी होने लगी | 10 प्रजातियां इसी दौरान साफ हो गईं |

वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्वालामुखी के कारण हुए इस भीषण जलवायु परिवर्तन को तो जैसे तैसे 14 जीव प्रजातियाँ झेल गयी थी लेकिन जो रही सही कसर थी उसके तक़रीबन 1.5 लाख साल बाद ब्रह्माण्ड से आये उस आकाशीय उल्का पिंड के पृथ्वी के टकराने पर पूरी हो गयी और तब बाकी की बची अन्य 14 प्रजातियां भी पूर्णतः समाप्त हो गयी और धरती से जीवन पूर्णतः नष्ट हो गया था | वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि उल्का पिंड और ज्वालामुखी के फूटने से जो असर हुआ वह धरती पर बाद के 35 लाख सालों तक रहा |

आज एक बार फिर वैज्ञानिक जलवायु में हो रहे भीषण परिवर्तन की तरफ इशारा कर रहे है और बता रहे है कि अगर इसी तरह से जलवायु परिवर्तन होता रहा तो इस बार धरती से मनुष्यों का सफाया होना तय है |

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