“मनुष्य को दान भी सोच समझ कर करना चाहिए”:आरती शास्त्री

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फतेहपुर चौरासी/उन्नाव(ब्यूरो)- मनुष्य को दान भी सोच समझ कर करना चाहिए। दान देने में कभी घमंड नहीं करना चाहिए। यदि कोई दान दे रहा हो तो उसका विरोध भी नहीं करना चाहिए । दान करने में अवरोध पैदा करने वाले की गति शुक्राचार्य जैसी होती है । विरोध करने के परिणाम स्वरुप शुक्राचार्य को एक आंख गवानी पड़ी थी।

यह बात बाबा हजारी कुटी फतेहपुर चौरासी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन आज आरती शास्त्री ने भक्तों को बताई ।उन्होंने राजा बलि की कहानी का वर्णन करते हुए कहा कि राजा बलि पूर्व जन्म में जुआरी थे।
एक जुआ में उन्हें कुछ धन मिला उस धन से उन्होंने अपनी प्रिय वेश्या के लिए एक हार खरीदा था और बहुत खुशी खुशी वह हार लेकर उस वेश्या के घर जाने लगे। लेकिन रास्ते में इन्हें मृत्यु ने घेर लिया और वह मरने वाला था कि उसने सोचा कि अब यह हार मै वेश्या तक तो नहीं पहुंचा पाऊंगा। इसे शिव को ही अर्पण कर दूं और यह विचार कर उसने वह हार शिव को अर्पित कर दिया और मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

जब मर कर वह यमराज के सामने उपस्थित हुआ और चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा जोखा देखकर जब बताया इसने तो अपने जीवन में पाप ही पाप किए हैं लेकिन मरते समय उसने जुएं के पैसे से अपनी प्रिय वेश्या के लिए खरीदा गया हार शिव को अर्पण कर दिया। बस यह एकमात्र इसका पुण्य है। चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने उससे कहा रे पापी तू खुद बता पहले पुण्य का फल भोगेगा या पाप का फल भोगेगा। जुआरी ने कहा पाप तो बहुत हैं पहले पुण्य का फल हमें दो । उसके बदले उसको दो घड़ी के लिए इंद्र बनाया गया।

वक्ता शास्त्री ने बताया कि कभी कभी गलत कार्य भी व्यक्ति को सही रास्ते पर पहुंचा देते हैं । इंद्र बनने पर वह अप्सराओं के नृत्य और सुरापान का आनंद लेने लगा। तभी नारद जी आते हैं उसे देख कर हंसते हैं और एक बात बोलते हैं कि अगर इस बात में संदेह हो कि स्वर्ग नर्क है तब भी सत्कर्म तो कर ही लेना चाहिए वरना अगर सत्कर्म नहीं हुए तो आस्तिक का कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन नास्तिक जरूर मारा जाएगा । यह बात सुनते ही उस जुवारी को होश आ गया उसने दो घड़ी पूरा इंद्रलोक दान कर दिया इसके प्रताप से पापों से मुक्त होकर वह इंद्र बना और बाद में राजा बलि हुआ। इस तरह से बलि की उत्पत्ति हुई और राजा बलि ने विश्वविजय करने के लिए अश्वमेघ यज्ञ किया और इसी के चलते उसकी ख्याति चारों ओर फैल गई। उसने अग्निहोत्र सहित उसने 98 यज्ञ संपन्न कराए। इस तरह उसके राज्य और शक्ति का विस्तार होता ही जा रहा था । तब उसने इंद्र के राज्य पर चढ़ाई करने का मन बनाया इसी तरह राजा बली ने 99वें यज्ञ की घोषणा की और उसमें सभी राज्यों और नगर वासियों को आमंत्रित किया।

माना जाता है देवता और असुरों की लड़ाई जंबूदीप की ईलावर्त क्षेत्र में 12 बार हुई। देवताओं की ओर से गंधर्व और यक्ष होते थे तो दैत्यों की ओर से दानव और राक्षस अंतिम बार हिरणाकश्यप के पुत्र प्रहलाद और उनके पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और इस युद्ध में देवता हार गए तब संपूर्ण जंबूदीप पर असुरों का राज्य हो गया। इसके पूर्व सुदीप शास्त्री ने राम कथा में भगवान् राम के जन्म की कथा से भक्तों को अवगत कराया ।

रिपोर्ट- रघुनाथ प्रसाद

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