रामनवमी एवं रामजन्म पर विशेष- सम्पादकीय

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अमेठी (ब्यूरो)- नवमी तिथि मधुमास पुनीता, सुकुल पक्ष अभिजित हर प्रीता”। आज रामनवमी है और आज ही ईश्वर ने ” बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुष्य अवतार”। ईश्वर ने आदिपुरूष मनु शतरूपा द्वारा तपस्या के बाद माँगे गये वरदान को साकार करने के लिये अयोध्या में उनके पुत्र के रूप में रामनवमी को प्रगट हुये थे। राजा दशरथ और कौशिल्या ही मनु शतरूपा हैं। सृष्टि की शुरुआत में इनकी तपस्या से खुश होकर ईश्वर ने इनके पुत्र रूप में आने का वचन दिया था। वैसे तुलसीदास जी ने तो लिखा है कि-” रामजन्म के हेतु अनेका”। ईश्वर कभी एक कार्य की पूर्ति के लिये अवतार नहीं लेता है।

भगवान विष्णु के प्रिय द्वारपाल जय विजय को राक्षस योनि से उन्हें मुक्ति भी दिलाना भी रामजन्म का एक कारण है। हमारा सौभाग्य है कि हम सब अवधवासी है और हमारे राजा रामचंद्र हैं। भगवान राम को पुत्र रूप में पाने वाले चक्रवर्ती महाराजा दशरथ जी साधारण मनुष्य नहीं थे बल्कि वह हमारे पहले आदिमानव हैं और वहीं हम सभी के उन्हीं के वंशज हैं । अपने भक्तों का मान सम्मान रखना और उन्हें कष्टों का उबारना ईश्वर का प्रथम गुण होता है। यहीं कारण रहा कि साक्षात ईश्वर को आदिमानव का पुत्र बनने में जरा भी हिचक नहीं हुयी और उन्होने त्रेतायुग में उनका पुत्र बनना स्वीकार कर लिया।
राजा दशरथ ही एक मात्र इतिहास में ऐसे महाराजा हुए हैं जो मृत्युलोक व देवलोक दोनों में विशेष स्थान रखते थे। यहीं कारण था कि देवासुर संग्राम में देवताओं को उनके पास मदद माँगने आना पड़ा। देवासुर संग्राम में देवताओं की तरफ से राजा दशरथ ही नहीं बल्कि उनकी छोटी रानी कैकेयी भी साथ गयी थी। देवासुर संग्राम में ही कैकेयी ने उनकी जान बचाई थी जिससे खुश होकर तीन वरदान माँगने के लिये राजा दशरथ ने उनसे कहा था। यहीं तीनो वरदान ही राजतिलक की जगह भगवान राम के बनवास व दशरथ मरण के कारण बने गये थे।

भगवान राम जिस समय दशरथ नन्दन के रूप में धराधाम पर प्रकट हुए उस समय उनके प्रिय किन्तु ब्रह्म कुमारों द्वारा शापित द्वारपाल जय विजय ने तीसरे जन्म में रावण कुम्भकरण बनकर साधु संतों का जीना हराम कर रखा था। संत महात्माओ को टैक्स के रूप में अपना खून देना पड़ रहा था। रावण अपने आपको अपने बाप को और अपनी औकात को भूल गया था।वह अपने को साक्षात ईश्वर मानकर अपनी पूजा अर्चना करने के लिये मजबूर करने लगा था और जो ऐसा नहीं करता उसका जीना हराम किये था।रावण के पिता महात्मा संत थे लेकिन उसकी माँ राक्षस वंश से जुड़ी थी।

ऐसा दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने इसलिए कराया था ताकि देवताओं को परास्त किया जा सके।रावण के आतंक से सभी दुखी थी और ईश्वर से बचाने की गुहार लगा रहे थे।भगवान राम मानव जगत को जीवन की राह सिखाने और सभी जीवों में समानता का बोध कराने आये थे। आजकल रावण से बड़े रावण हमारे बीच पैदा हो गये हैं जो उससे बड़े दुराचारी और आतंकी है। वैसे तुलसी बाबा ने राक्षसों की पहचान बताते हुये लिखा है कि-” माने मात पिता नहि बचना साधुन से करवावैं सेवा,जाके इ आचरन भवानी ते जानेऊ निशचर सम प्रानी”।वह रावण का चरित्र था कि उसने सीता जी को लंका ले जाने के अपने राजमहल से दूर एक वाटिका में महिला सुरक्षा कर्मियों की देखरेख में रखा और कभी अकेले बिना मंदोदरी के उनके पास नहीं गया।

इतना ही नहीं उसने सीताजी को एक माह का समय भी दिया और कहा कि-“मास दिवस मा कहा न माना तब मरिहौ तानि कृपाना”। आजकल लोग एक माह क्या एक घंटे का मौका नहीं देते हैं और जबरिया इज्जत पर डाका डाल देते हैं।जो परिस्थितियाँ उस समय रावण राज में थी उससे बढ़कर इस समय चल रही हैं।प्रजा के रक्षक ही भक्षक बनते जा रहे हैं। तो फिर सवाल उठता है कि क्या ईश्वर राम के रूप में पुनः इस धराधाम पर आकर इन अनाचारियों पापाचारियों अत्याचारियों भ्रष्टाचारियों का सर्वनाश करेंगे ?इन कलियुगी रावणों से धरती धर्म संस्कृति गाय साधु संत और ईश्वर भक्त सभी त्रस्त व दुखी हो रहें हैं ।हे भगवान! इस धरती पर इन कलियुगी रावणो का विनाश और भक्तों का कल्याण करने एक बार फिर से राम बनकर आ जाओ। जय श्रीराम। रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

रिपोर्ट-हरि प्रसाद यादव

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