करोड़ों रूपये जारी होने के बावजूद नहीं हो रहा गाँवों का विकास

0
149

modi-varanasi
बछरावाँ-रायबरेली : पंचायतीं राज व्यवस्था में प्रधानों को वर्ष 1985के पहले न तो आज की तरह बजट आता था। न ही सरकारी योजनाओं को लागू होने के बाद सबसे पहले 1995 में चुनाव कराये गये। तब से प्रधानी पद का कद दिन प्रतिदिन बढ़ता गया। प्रधान बनने वाले को भले ही अपने अधिकारों व विकास योजनाओं की जानकारी न हो पर आने वाले बजट का वो बराबर इन्तजार करते रहते है। सत्ता विकेन्द्रीकरण पंचायती राज व्यवस्था मे प्रधान का पद व अधिकार और पैसे के कारण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर स्वास्थ, शिक्षा, निर्माण कार्य, राशन दुकान, पेंशन योजनाओं का निर्धारण आदि के लिए प्रधान के पास धन वर्षा होती रहती है। इसी के चलते राष्ट्रीय नेता तक अपने आदमी को प्रधान बनाना चाहता है।

विभिन्न योजनाओं से लाखों रूपये ग्राम पंचायतों को प्रति वर्ष आवन्टित किया जाता है। इसमें मिड डे मिल, बी.आर.जी.एफ, मनरेगा, ग्यारहवें व बरहवें वित्त अयोग के लाखों रूपये प्रति माह ग्रमा पचायतों द्वारा खर्च किए जा रहे हैं। इस बचट से गाँव की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। वर्ष 2005-2006 से पंचायतों में एक तरह से कुबेर खजाना आ गया है। मनरेगा के तहत गाँवो में विकास कार्य कराने के लिए डिमान्ड के अनुरूप लाखों रूपये प्रति माह दिये जाते है। विद्यालय में बच्चों को दोपहर का भोजन दिलाने की जिम्मेदारी भी प्रधान को ही दी गई है। मिनी सचिवालय के निर्माण के लिए बी.आर.जी.एफ. योजना के अन्र्तगत लाखों रूपये ग्राम पंचायतों को दिये जा रहे हैं। अकेले मनरेगा के तहत लगभग दस लाख रूपये की धन राशि आवन्टित की जाती है।

रिपोर्ट – राजेश यादव

हिंदी समाचार- से जुड़े अन्य अपडेट लगातार प्राप्त करने के लिए लाइक करें हमारा फेसबुक पेज और आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here