पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं तथाकथित पत्रकार

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वाराणसी (ब्यूरो) पत्रकारिता को बदनाम कर रहे है तथाकथित पत्रकार राष्ट्रचंडिका/समाज के समाजिकरण तथा समय समय पर समाज के सन्दर्भ में सजग रहकर नागरिको तथा शासनकर्ता व बुद्धिजीवी वर्गो में दायित्व बोध करने की कला को पत्रकारिता की संज्ञा दी गयी है। समाजहित, राष्ट्रहितमें सम्यक प्रकाशन को पत्रकारिता कहा जाता है असत्य, अशिव, असुन्दर पर सत्यम शिवम् सुन्दरम की शंख ध्वनि ही पत्रकारिता है।

मनुष्य स्वाभाव के हीन व्यक्तियेां को उत्तेजना देकर, हिंसा द्वेश फैलाकर, बडों की निंदा कर, लोगों की घरेलू बातो पर कुत्सित टीका टिप्पणी कर, अमोद प्रमोद का अभाव, अश्लीलता से पूर्ण करने की चेेष्टा कर तथा ऐसे ही अन्य उपायों से समाचार पत्रों की बिक्री और चैनलों का क्रेज तो बढाया जा सकता है। महामूर्ख धनी की प्रसशा की पुल बांध कर तथा स्वार्थ विशेष के लोगों के हित चिंतक बनकर भी रूपया कमाया जा सकता है। देश भक्त बनकर भी स्वार्थ सिद्धि की जा सकती है। लेेकिन सब कुछ अगर पत्रकारिता के आंड़ में हो तो कितना शर्मनाक है।

वाराणसी से लगाकर देहात क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह फैले तथाकथित पत्रकार, पत्रकार शब्द के गौरव को नष्ट करने में लगे हुये हैं। क्षेत्र में दर्जनों ऐसी गाड़ियाँ हैं जिनमें प्रेस अथवा पत्रकार लिखा हुआ है, पर वास्तविकता यह है कि ऐसे लोग न किसी समाचार पत्र से जुडे हुये हैं और न ही व पत्रकार हैं न उनका अखबार क्षेत्र में आता हैै। दलाली में जुटे तथाकथित पत्रकारों ने कर्मठ और निष्ठावान पत्रकारों को बदनाम करने की ठान ली है। कहीं लकड़ी कटान से अवैध वसूली तो कहीं लोगों को गुमराह कर दलाली करने में माहिर हैं, जिनका एक ही काम सुबह अपने घर से निकलने के बाद थाने की कुर्सी पर जम कर बैठ जाते हैं और मुंशी से लगाकर दरोगा के पैसों की फ्री की चाय का इंतजार करते हैं, इनकी नीचता को देखकर जनता हैरान है। कुछ तथाकतिथ ऐसे भी हैं जो कि पत्रकार व पत्रकारिता को बदनाम करने के लिए अपने लच्छेदार बातों से हाईफाई बताकर किसी का शस्त्र लाइसेंस बनवाने, जमीन का पट्टा करवाने, ठेका दिलाने, स्थानान्तरण करवाने अथवा रूकवाने आदि बहुत से कार्य करवाने आदि का ठेका लेकर अच्छी खासी दलाली चमाका रहे हैं ।

दिलचस्प बात यह है कि इनके बिछायें हुये जाल में वहीं फसते है। जो अपने को सबसे बड़ा सयाना समझते है। इन सयानों को यही तथकथित पत्रकार जोक की तरह खून चूस कर छोड देते हैं । जबकि इनकी असलियत की जांच की जाये तो यह तथाकथित पत्रकार लिखने में जीरो है और तालमेल मिलाने में हीरो हैं । क्षेत्र में तो कुुछ ऐसे पत्रकार पनप चुके हैं जो पत्रकारिता की आंड़ में गाडिय़ां चलवाते हैं। पत्रकारिता का रौब दिखाकर पंचायत सेक्रेट्रियों से लगाकर प्रधान, ईंट भट्टा मालिक, वन विभाग, बड़े-बड़े व्यापारी, गैस एजेंसी, सरकारी अस्पताल, ब्लॉक नगर पंचायत ठेकेदार, थाना, पेट्रोल पंप, होटलों से विज्ञापन के नाम पर वसूली करते हैं। जब कि देखा जाए तो इन्ही तथाकथित पत्रकारों की यह घिनौनी करतूत असली पत्रकारों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। जब कभी पुलिस द्वारा वाहन चेकिंग अभियान चलाया जाता है तो प्रेस व पत्रकार लिखा होने का फायदा उठाकर यह तथाकथित पत्रकार बच जाते हैं। क्योंकि यह तथाकथित पत्रकार इतने शातिर हैं की इनकी लच्छेदार भाषा शैली तथा मिलबांट कर खाने वाली प्रणाली के चलते इनकी पुलिस विभाग से लेकर सभी महत्वपूर्ण विभागों तक पहुँच होती है। जबकि न तो इनके पास लाइसेन्स रहता है और न ही जिस गाड़ी से चलते है उसका बीमा।कई बार इन तथाकथित पत्रकारों पर नकेल कसने के लिए पुलिस अधिक्षक द्वारा पहल की बात कही गई, लेकिन फिलहाल अभीतक अमल में नही आया है, इन फर्जी पत्रकारों तथा पत्रकारिता की आड़ में कर रहे दलाली वाले तथाकथित पत्रकारों की वजह से अपने पेशे को मिशन मान कर जुटे पत्रकारों की कलम भी कलंकित हो रही है।

रिपोर्ट – सर्वेश कुमार यादव

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