इंग्लिश के डर से स्कूल छोड़ रहे हैं बच्चे और मै ऐसा नहीं होने दूंगा

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मैंने लगभग अपना सारा बचपन प्राइमरी स्कूल में बिताया, पहली क्लास से चौथी क्लास तक सब ठीक था लेकिन 5वीं क्लास में हमें इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया हम सब ने असफल रहे और हौसला छोड़ दिया | हम सब मछली बाज़ार में पले – बढे मेरी उम्र के बच्चे जल्दी पैसा कमाने के मौकों की तलाश में रहते थे, 17 साल पहले बास्केट से एक मछली गिर जाना बड़ी बात नहीं थी और वे इसे उठाकर बेच देते थे और इस तरह वे एक – दो घंटे में 100 रू कमा लेते थे और कभी वापस स्कूल जाने की नहीं सोचते थे | इस पैसे को वे ड्रग और शराब पर खर्च करते थे, उस समय मेरे पिता ने मुझे स्कूल जाने पर मजबूर किया मै भी दुसरे लड़कों के तरह बनना चाहता था इसलिए मुझे इस बात से बहुत चिढ़ होती थी पर आज मेरे पास उनका शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द ही नहीं हैं |

मुझे याद है 2 किशोर लड़कों को सिगरेट पीते और स्कूल से भागते देख मेरे दिमाग में एक बात घर क्र गयी की सिर्फ इंग्लिश के दर की वजह से ज्यादातर प्राइमरी स्कूल के बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, मै उन्हें दोबारा स्कूल लाने के तरीकों के बारे में सोचने लगा और फूटबाल पर आकर रुका | मैंने 18 स्कूल छोड़ चुके बच्चों के साथ एक लीग की शुरुवात की और एक शर्त रखी कि खेलने के लिए जगह, फूटबाल गियर और प्रशिक्षण सबकुछ सिर्फ उसे ही मिलेगा जो रोज स्कूल जायेगा और अब वे खेलने के लालचवश रोज स्कूल जाते हैं और इंग्लिश में एक दुसरे की मदद करते है ताकि एक साथ पास हो सकें और आगे खेल सकें |

आज हमारे साथ 800 ऐसे छात्र हैं जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया था और अब वे रोज स्कूल जा रहे हैं, हमारा लक्ष्य 2020 तक ऐसे 20000 बच्चों को वापस स्कूल भेजने का है | मेर सिर्फ एक ही लक्ष्य है की बच्चे इंग्लिश के डर से स्कूल न छोड़ें और इस बात समझे की इंग्लिश के बिना भी हम उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने इसके साथ |

 

Via – Humans of Bombay

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