भू-जल संरक्षण के नाम पर औपचारिकता

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बछरावां/रायबरेली (ब्यूरो)- सरकार द्वारा भू-जल संरक्षण के प्रति एक कार्य योजना के तहत मनमाने ढंग से ग्रामीण अंचलों में इंडिया मार्का नलो को लगवाकर व तालाबों को खुदवाकर औपचारिकता तो पूरी कर ली गयी लेकिन सच्चे मायनो में देखा जाए तो आज के समय मे यह सब शो पीस बनकर रह गए है।

नलो व तालाबों के निर्माण के समय तो ग्रामीणों की खुशियों का ठिकाना न रहा,लेकिन आज तक उनकी हालत पर वही ग्रामवासी आंशू तक नही बहा पा रहे है। क्योंकि ऐसे कामों में मात्र खानापूर्ति करके सरकार के नुमाइन्दे व दलाल अपनी जेबें ही भरते है। कागजों पर ही सारी कार्यवाही खत्म हो जाती है और आमजन मानस को निराशा ही हाथ लगती है। सरकार ग्रामीणों के उत्थान का सिर्फ ढ़िढोरा ही पीटती है।

जहाँ एक ओर लाखों-करोड़ो खर्च कर आदर्श तालाबों का निर्माण कराया गया या यूं कहे कि ग्राम प्रधानों द्वारा मात्र खानापूर्ति के तौर पर निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को तालाबो में पानी भरवाकर, सब कुछ ठीक-ठाक दिखाकर संतुष्ट तो कर दिया गया। लेकिन आम जन-मानस कहा तक संतुष्ट हो सका, यह पाना कहना मुश्किल है। जनहित में लोगो के सामने जानवरो के पीने के लिए पानी की समस्या आये दिन गम्भीर होती जा रही है। यदि सही और निश्पक्ष ढंग से इन आदर्श तालाबो का निरीक्षण कर लिया जाए तो ऐसी योजनाओ की कलई खुलते देर नही लगेगी और सरकार को भी आइना दिख जाएगा।

कुओं का अस्तित्व वनाये रखने के लिए योजनाए चलाई गई लेकिन सम्बंधित विभागीय कर्मचारियों के द्वारा सम्भवतया गम्भीरता पूर्वक कार्य नही किया गया। जिसके परिणाम स्वरूप ग्रामीण अंचलों में अधिकांशतः कुँए सूखकर नष्ट हो चुके है। लगता ही नही की वहाँ कभी कुआँ भी था। कमोबेश यही स्थिति नहरों की भी है।

जो नहरे हमेशा पानी से लबा-लब रहती थी उनमे आज पानी कभी-कभी ही दिखता है। क्योंकि जब सरकार की तरफ से नहरो की सफाई व सौन्दर्यीयकर्ण आदि के लिए योजनाए आती है। तब भी ये ठेकेदार कागजो पर मात्र खानापूर्ति करके नहरों की घास छीलकर पूरी कर देते है। लेकिन अधिकांश नहरे पटी नजर आती है। विडम्बना तो इस बात की है कि आज भी कुछ गाँव ऐसे है जहाँ स्वच्छ पानी एक सपने जैसा है। वहाँ नल तो क्या कुँए भी नही रह गए है।

जल के शुद्धिकरण के लिए भी विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम तैयार किये जाते रहते है, लेकिन समस्या तो मूलतः जल की है। जब जल ही सम्भव नही है तो जल की वैकल्पिक व्यवस्था कैसे संभव हो सकेगी। शासन द्वारा भू-जल भंडारण को यथावत बनाये रखने के लिए व जल संरक्षण के लिए सरकार द्वारा अभी तक विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जा चुका है। लेकिन प्रत्यक्षण जो भी है वह संतोष जनक नही है। वही प्रशासन की स्थिति मूक-बधिरों सी जो चुकी है। जो न तो समस्याओ को सुनने के पक्ष में है और न ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने की स्थिति में। आने वाले समय मे भू-जल एवं जल संकट को लेकर जनमानस की चिंताएं बढ़ती जा रही।

रिपोर्ट -जय सिंह पटेल 

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