सुमन मोरे : कचरा बिनने से लेकर जेनेवा सम्मलेन में वक्ता बनने तक का सफ़र

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किसी मनोहर कहानी की तरह, पुणे की दरिद्रतापूर्ण गलियों से निकलकर वह अनपढ़ कचरा बीनने वाली दुनिया भर से एकत्रित हुए 2,000 प्रतिनिधियों की सभा को मंच से संबोधित कर रही थी |

स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा में हुए 104वें अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक सम्मलेन में सुमन मोरे एक अतिथि वक्ता के तौर पर अपनी ही तरह के कार्य में लगे लोगों के संघर्षों पर दुनिया भर के कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श के लिए आमंत्रित थीं |

अपने सूखा ग्रस्त गाँव से विस्थापित सुमन ने पुणे में नौकरी पाने की जीतोड़ कोशिश की, जब लगातार कई कोशिशों के बाद भी सुमन को कोई नौकरी नही मिली तो सुमन ने सडकों पर कचरा बिनकर अपनी जीविका चलाने की कोशिश की लेकिन दिनभर में 10-12 घंटे के कठिन परिश्रम के बाद भी सुमन मुश्किल से 40-50 रुपये ही कम पाती थी जोकि उसके 6 सदस्यों वाले परिवार के लिए काफी नहीं था, अपने काम की वजह से सुमन को लोगों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता था, सुमन बताती हैं “कहर बीनते वक़्त लोग अक्सर हमें चोर कहकर बुलाते थे, और हमें बिना किसी कारण पुलिस स्टेशन ले जाया था, कई बार तो पुलिस भी हमें परेशान करती थी |

जब सुमन को इस बात का एहसास हुआ की अगर कचरे को अलग – अलग एकत्रित किया जाये तो कचरा प्रबंधन और भी किफायती और सरल हो सकता है, सुमन और अन्य कचरा बिनने वालों ने नगर पालिका के साथ मिलकर स्थानीय व्यापारियों के स्थान पर कचरा प्रबंधन केन्द्रों पर कचरा देना शुरू कर दिया, इस पहल के साथ ही उस क्षेत्र के कचरा बिनने वालों का जीवन पहले से बेहतर हो गया, सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से कचरा बिनने वाले कम से कम 5000 रुपए प्रतिमाह कमाने लगे और आईडी कार्ड भी जारी किये गये ताकि वे पूरे सम्मान के साथ अपना काम कर सकें |

सुमन 2 वर्षों से एक प्रतिनिधि की तरह इस सम्मलेन में शामिल हो रहीं हैं | सुमन ने कहा “ उस पूरे हॉल में अकेली मै साड़ी में थी और सबसे कठिन था उस वातानुकूलित हाल में बैठना क्योंकि मै इसकी आदत नहीं थी, लेकिन मैंने खुद को संभाला, सबने मेरी और भारतीय संस्कृति तारीफ की और अगले दिन उन लोगों ने भी साड़ी पहनी !”

अखंड भारत परिवार सुमन मोरे की दृढ़ता विश्वास और कठिन परिश्रम की सराहना करता है | सुमन जैसे लोग सारे समाज के लिए प्रेरणा का श्रोत हैं |

यहाँ देखिये जिनेवा सम्मलेन में सुमन मोरे का वक्तव्य….

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