गोमुख से गंगा सागर तक की गंगा सद्भावना यात्रा के काशी पहुंचने पर स्वागत किया गया

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वाराणसी (ब्यूरो)- गोमुख से प्रारम्भ हुई गंगा सद्भावना यात्रा के रविवार को वाराणसी पहुंचने पर साझा संस्कृति मंच के सदस्यों द्वारा स्वागत किया गया. ज्ञातव्य है कि अंतरराष्ट्रीय नदी दिवस 30 सितम्बर को गोमुख से प्रारम्भ हुई गंगा सद्भावना यात्रा मकर संक्राति 14 जनवरी को गंगा सागर में समाप्त होगी।

इस अवसर पर नेपाली कोठी नदेसर स्थित विश्वज्योति जनसंचार केंद्र सभागार में आयोजित संगोष्ठी “स्वामी सानंद जी के सपने और हमारा दायित्व” में सर्वप्रथम प्रो. जी डी अग्रवाल के चित्र पर माल्यार्पण श्रद्धाजलि अर्पित की गयी. गंगा सद्भावना यात्रा के नेत्रित्वकर्ता जल पुरुष एवं मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह ने कहा कि गंगा हमारी माँ है और इस माँ की रक्षा करते हुए ही स्वामी सानन्द जी शहीद हो गए, अब हम सभी को यह जिम्मेदारी बनती है कि हमे माँ के सम्मान और संरक्षा की लड़ाई को अपनी लड़ाई मानकर सड़को पर उतरना होगा. उन्होंने कहा कि गंगा को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए न्यायालय से पारित 200 मीटर निर्माण पर रोक के आदेश को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। गंगा की पवित्रता, अविरलता के साथ निर्मलता के बारे में आम जन को जागरूक किया जाना चाहिए.

इस अवसर पर संबोधित करते हुए यात्रा दल के एक अन्य सदस्य मेजर (डा) हिमांशु सिंह ने कहा कि गंगा के मूल स्वरूप को नष्ट होने से बचाने के लिए उसका प्रवाह निर्बाध व अविरल होना चाहिए। गंगा नदी पर बड़े बांध न बनाकर छोटे छोटे बांध का निर्माण किया जाना चाहिए। गंगा नदी के किनारे एस टी पी प्लांट की क्षमता उसमे प्रवाहित सीवरेज के अनुसार बढाई जानी चाहिए। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी प्रकार का औद्योगिक कचरा गंगा या सहायक नदियों में न जाने पाए.

यात्रा के संयोजक गांधीवादी चिन्तक रामधीरज भाई ने गंगा सद्भावना यात्रा के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य गंगा की अविरलता एवं संरक्षण के लिए व्यापक जनजागरूकता के साथ क्षेत्रीय जलाशयों एवं नदियों के संरक्षण हेतु लोगो को संगठित करना है. यह इसलिए भी आवश्यक है क्योकि इन जलाशयों में फैक्टरियों, नालों का गन्दा पानी अनवरत मिलाया जा रहा है, तथा अबाध रूप से नदियों में किये जा रहे खनन एवं निर्माण कार्यों के कारण आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे हानिकारक तत्व भूमिगत होकर पेयजल के माध्यम से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन रहे है और सरकारें इस विषय में कोई भी सकारात्मक कदम उठाती नही दिख रही है.

संगोष्ठी का सचालन करते हुए साझा संस्कृति मंच में संयोजक फादर आनंद ने कहा कि प्रो. जी. डी. अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद जी का गंगा के प्रति आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण था, उनके द्वारा बताये तथ्यों के अनुरूप नीतियां बनाने से ही गंगा और सहायक नदियों को पुनर्जीवन मिल सकता है.

सामाजिक कार्यकर्ता वल्लभाचार्य पाण्डेय ने बताया कि स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का काशी से बहुत लगाव था, वे यहाँ की पांचो नदियों (गंगा, वरुणा, गोमती, असि एवं नाद) को निर्मल एवं अविरल बनाये जाने के हिमायती रहे. उनके संदेशो और संकल्प को जीवित रखना आवश्यक है इसी के दृष्टिगत जन सहयोग से उनकी एक प्रतिमा गंगा वरुणा के संगम आदि केशव घाट पर स्थापित किये जाने की तैयारी चल रही है जहाँ उनके संदेशों को भी शिलापट्ट पर उल्लिखित किया जाएगा.

संगोष्ठी में सतीश सिंह, जागृति राही, राम जनम भाई, डा. अनूप श्रमिक, दीन दयाल सिंह, प्रदीप सिंह, आशीष, फादर दयाकर, मुकेश झांझरवाला, संजीव सिंह, मिथिलेश दुबे, राजकुमार पटेल, आदित्य विक्रम, सच्चिदानंद ब्रह्मचारी, रमेश, आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे.

रिपोर्ट- राजकुमार गुप्ता

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