ग्राम प्रधान एवं सचिवों की मिलीभगत से गांवों मे चल रहा गोरखधंधा

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प्रतीकात्मक फोटो

चाँदमारी/वाराणसी (ब्यूरो)- ग्राम पंचायतों मे सरकारी पैसों के दुरुपयोग की शिकायतें हमेशा से मिलती रही है। सरकारी पैसों के इस्तेमाल विकास के लिये न होकर प्रधानों एवं अधिकारियों के बीच बंदरबांट होने का आरोप हमेशा से लगता आया है। जब इस बात की तहकीकात करने का प्रयास किया गया तो जो हकीकत सामने आया वह काफी चौंकाने वाला है।

ग्राम पंचायतों मे विकास कार्यों के लिये शासन स्तर से भारी मात्रा मे पैसा आता है लेकिन वह पैसा गांव के विकास मे न खर्च होकर प्रधानों सचिवों एवं अन्य पंचायती अधिकारियों के विकास के लिये खर्च होता है | और जनता हमेशा बुनियादी सुविधाओं के लिये तरसती है। ग्राम पंचायतों को मिलने वाली रकम के बारे मे पता करने पर मालूम हुआ की शासन से गांवों मे विकास कार्यों को सम्पादित कराने के लिये हर वर्ष लाखों करोड़ों रुपये पंचायतों को दिया जाता है।

वर्ष 2016 मे जहाँ छोटी ग्राम पंचायतों मे यह रकम प्रत्येक वर्ष कम से कम 16 लाख रुपये है तो वही बड़ी ग्राम पंचायतों मे यह रकम लगभग 25 लाख से लेकर 1 करोड़ तक होता है। इतना धन मिलने के बावजूद भी गांवों मे विकास देखने को कहीं नही मिलता। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है की ग्राम प्रधान और सचिव विकास कार्यों को कराने मे पारदर्शिता नही रखते और जनता को गुमराह कर पैसों को गटक जाते हैं।

दरअसल इस बंदरबांट के पीछे कहीं न कहीं उच्च अधिकारी भी जिम्मेदार होते हैं, जो गांव मे विकास कार्यों के सत्यापन मे दिलचस्पी नही लेते। नियम के मुताबिक ग्राम सभा मे कोई भी कार्य कराने के पहले ग्राम सभा की खुली बैठक मे विकास योजना बनायी जाती है जिसे पंचायत का अनुमोदन प्राप्त होता है । उसके बाद सम्बन्धित कार्य के कराये जाने के लिये समाचार पत्रों मे गजट निकालकर निविदाएँ आमंत्रित की जाती हैं और उसके बाद प्राप्त निविदाओ मे से सबसे कम खर्च पर काम करने की संस्तुति देने वाले फर्म से काम कराया जाता है । लेकिन हकीकत मे होता है ठीक इसके उलट खुली बैठक की औपचारिकता प्रधान व सचिव कागजों पर ही निबटा लेते हैं और न तो किसी कार्य के लिये निविदा ही आमंत्रित की जाती है और न ही इसका कोई प्रकाशन कराया जाता है।

कभी किसी पंचायत द्वारा कोरम पूरा करने के लिये गजट प्रकाशन करा भी दिया जाय तो उसके बाद किसी प्रकार की निविदा न लेकर अपने किसी सम्बन्धित फर्म या व्यक्ति से कमीशन के लालच मे काम कराया जाता है और अनावश्यक धन का व्यय दिखाकर मोटी धनराशि अंदर कर ली जाती है। कार्यों के निष्पादन मे घटिया सामग्री की खरीद ऊँचे दामों पर की जाती है ताकि कमीशनखोरी हो सके। चालू वित्तीय वर्ष मे एक बड़ा तथ्य सामने आया है जिसमे विकास खंड हरहुआ के लगभग सभी ग्राम पंचायतों मे बड़े पैमाने पर सोलर लाईटो की खरीद की गयी।

प्रत्येक सोलर लाइट के लिये 22000 से 27000 रुपये तक का भुगतान दिखाया गया जबकि हकीकत इससे ठीक विपरीत है । नेडा की कीमत पर घटिया और निम्न स्तर की इन लाइटो की वास्तविक मूल्य 7000 -9000 रुपये है जिन्हें किसी अनधिकृत फर्म या दुकान से खरीदा गया। मजे की बात तो यह है की ज्यादातर फर्मों का न तो कोई नाम है और न कोई पता। पैसे की कमीशनखोरी के लिये ऐसी फर्मों से सोलर लाइटो की खरीद की गयी जबकि नियम के मुताबिक इन लाइटो की खरीद के लिये भी टेंडर निकाला जाता है और इस्टिमेट तैयार किया जाता है। सरकार की ओर से सोलर लाइट की खरीद के लिये नेडा जैसी फर्मों को अधिकृत किया गया है लेकिन नेडा से लाइट खरीदने पर कमीशन नही मिलता है ।

अतः गैर पंजीकृत फर्मों से लाइट खरीद कर सरकारी पैसों की लूट की गयी है। कई गांवों मे तो अनावश्यक रुप से सोलर लाइट लगवा दिये गये हैं जिनकी ज़रूरत नही थी। मजे की बात तो यह है की कई जगहो पर कागजों पर तो सोलर लगा दिये गये लेकिन धरातल पर इसकी जानकारी ग्रामवासियों को ही नही है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक विकास खंड हरहुआ मे ग्राम पंचायत स्तर पर सोलर लाइटो की खरीद फरोख्त मे करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये हैं।

सूत्र बताते हैं की सोलर लाइट के निर्माण एवं विपणन का कार्य सरकारी एजेंसी नेडा के द्वारा किया जाता है। जहाँ पर लाइटो की गुणवत्ता और मानक के अनुसार उसकी कीमत लगभग 22 हजार से 27 हजार रुपये तक प्रति लाइट होती है लेकिन इस एजेंसी से खरीद करने पर कमीशनबाजी का गोरखधंधा नही चल पाता। इसकी वजह से फर्जी फर्मों के माध्यम से लाइटो की खरीद कर करोड़ों रुपये का बंदरबांट उक्त विकास खंड मे हुआ है और ऐसी ही स्थिति लगभग अन्य ब्लाकों मे भी देखने को मिल सकती है। अगर इन कार्यों की निष्पक्ष एवं धरातलीय जाँच कराई जाय तो करोड़ों रुपये के घोटाले का पर्दाफाश हो सकता है ।

रिपोर्ट -नागेन्द्र कुमार यादव

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