सियासी समर में हरीश रावत बने ‘वन मैन आर्मी’

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harish rawat

देहरादून- उत्तराखंड में हरीश रावत की स्थिति रोमन कथाओं के नायक ‘हरक्यूलिस’ के समान हो गई है। सुबह गढ़वाल, दोपहर हरिद्वार और शाम को कुमाऊं। पिछले काफी समय से रावत की दिनचर्या कुछ इसी रफ्तार से चल रही है। वह ज्यादा से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हैं।

पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ समय पहले मंत्रियों को आसपास की तीन और सीट जिताने की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन उत्तराखंड कांग्रेस में बगावत से उपजे हालातों में यह मुमकिन नहीं हो पा रहा है। दूसरी तरफ, प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय भी सहसपुर सीट पर सिमट चुके हैं। उन्हें भाजपा प्रत्याशी के साथ-साथ कांग्रेस से बागी होकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे आर्येंद्र शर्मा से जूझना पड़ रहा है।

मुश्किल हालातों में बने मुख्यमंत्री-
2012 में रावत ने मनमोहन सरकार में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री का पद संभाला, 2013 की जलप्रलय में राहत एवं बचाव कार्यों को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच विजय बहुगुणा ने इस्तीफा दे दिया था | बहुगुणा के इस्तीफे के बाद ही फरवरी 2014 में रावत मुख्यमंत्री बने, जुलाई में धारचुला सीट पर हुये विधानसभा उप चुनाव को जीतकर वे मुख्यमंत्री बने थे।

बगावत से निपटकर बचाई सरकार-
बता दें कि मार्च 2016 में कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत कर दी थी जिसके बाद रावत सरकार अल्पमत में आ गई थी और सत्ता की कुर्सी जाना लगभग तय हो गया था | इस दौरान यह राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लग गया था | केंद्र सरकार के इस
फैसले के खिलाफ रावत अदालत पहुंचे थे | बाद में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया था जिसके बाद मई में विश्वास मत हासिल कर रावत ने अपनी सरकार बचा ली थी वे पुनः सीएम बन गए थे साथ ही उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हट गया था।

निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रति नरमी-
रावत ने भाजपा और पीडीएफ से बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे नेताओं के प्रति नरम रुख अपनाया है। पार्टी के विरोध के बावजूद उन्होंने धनौल्टी सीट पर प्रत्याशी न उतारने और सरकार में सहयोगी रहे निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पंवार का समर्थन करने का फैसला लिया है। वहीं, कुछ सीटों पर उन्होंने अपेक्षाकृत कम मजबूत प्रत्याशी उतारे हैं।

प्रचार मुख्यमंत्री के केंद्र में-
उत्तराखंड में पार्टी का इकलौता बड़ा चेहरा होने की वजह से कांग्रेस ने अपने प्रचार अभियान का ताना-बाना मुख्यमंत्री रावत के ईद गिर्द बुना है। ‘उत्तराखंड खुशहाल-रावत पूरे पांच साल’ और ‘रावत के नौ संकल्प’ का नारा भी इसी रणनीति का हिस्सा है। डिजिटल रथों पर भी मुख्यमंत्री के संदेश और सरकार की उपलब्धियों को प्रमुखता से दर्शाया जा रहा है।

दो सीटों से चुनाव लड़ रहे-
रावत उत्तराखंड के इतिहास में दो विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाले पहले नेता हैं। उन्होंने भाजपा के कब्जे वाली हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा सीटों पर ताल ठोकी है। ये सीटें क्रमश: हरिद्वार और उधमसिंहनगर जिलों में आती हैं। 70 सदस्यीय विधानसभा में दोनों जिले 20 विधायक भेजते हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस उधमसिंहनगर व हरिद्वार में 5 ही सीट जीत पाई थी।
रिपोर्ट- मोहम्मद शादाब
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