वह पूरे दिन कड़ी मेहनत से कमायें पैसे का भोजन कराता था गरीब को

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PC- उदंती

मैनपुरी(ब्यूरो)- वह घंटाघर में शिवजी को प्रणाम करने के बाद पूरे दिन पीठ पर 100 किलो का बोरा लाद दुकानदारों के यहां पटकता था और शाम को जो मजदूरी मिलती थी। उससे पुराने जिला अस्पताल में भर्ती किसी गरीब मरीज के लिये पूरे दिन कमाई गई पूंजी से उसका पेट भरना और बचे पैसे से स्वयं की जीवका चलाना ही उसका उद्देश्य था। वह मर गया लेकिन जब उसके कपड़े फैंके गये तो उसमें निकले कागज के नोट कई लोगों का भाग्य बदल गये और मैनपुरी के इतिहास को एक फिल्म दे गये ‘‘ बदनाम गली’’ और उपन्यास भी एक सड़क 57 गलियों से जो मैनपुरी की छाप कथाकार कमलेश्वर जी ने छोड़ी वह आज भी पुराने दिलों में धडकती है।

जनपद की हर गली कोई न कोई अजब-गजब कहानी या प्रतिभाओं से भरी पड़ी है। कोई अंग्रेज हूकूमत के लिये बागी बना तो किसी ने प्रभू के ध्यान मग्न होकर धर्म जागरण को मार्ग अपनाते हुये इस वीर भूमि को अंग्र्रेज हूकूमत का सिर मोर बनाने का प्रयास किया। कोई डकैत बनकर अमीरों को लूटता रहा और कोई फकीर बनकर न्यामतें लुटाता रहा। कुछ ऐसे लोग भी हुये जिन्होेने कड़ी मेहनत करने के बाद किसी गरीब के घर का चूल्हा जलाया। इन्ही में एक नाम काफी चर्चा में रहा वह था रंगीला पल्लेदार का जिसकी दिनचर्या घंटाघर के शिव मंदिर से आरम्भ होती थी और शाम पुराने सरकारी अस्पताल में अपनों के ईलाज के लिए आये किसी गरीब के लिए भोजन व्यवस्था करने में लोग बताते थे कि वह हर रोज तांगा स्टेण्ड के पीछे स्थिति पपीता महाराज के होटल से दो लोगों का खाना बनवाकर लाता था और खाना किसी गरीब तीमारदार को खिलाने में उसे संतोष होता था।

इसके पीछे उसकी क्या मंशा रही होगी यह तो मरते दम तक पता नही चल सका पर लोगों को जानकारी मिली कि अपनी मेहनत से दूसरे का पेट भरने वाला रंगीला पल्लेदार दिल्ली चाट वाले की दुकान के नीचे मरा पाया गया। लोगो ने उसकी अंतिम क्रिया के बाद उसके कपड़े, बिस्तर, क्लव घर मंडी के पीछे बह रहे नाले में फैंक दिये। जहां विचरण कर रहे जानवरों ने जब उसका बिस्तर फाड़ा तो वहाँ शौच कर रहे एक दुकानदार को फटे बिस्तर में नोट चमकते दिखाई दिये। धीरे-धीरे यह खबर पूरी मंडी में फैल गई और तमाम जरूरत मंद और लालची लोग उसके बदबूदार कपड़ों में छिपी खून पसीने की कमाई पर टूट पड़े किसी को हजार मिले तो किसी को पांच हजार किसी को सौ मिली तो किसी को दस कुल मिलाकर उसके गद्दे कपड़े कई लोगों के आर्थिक मददगार बने।

भर्राई आवाज और तेज कलम थी कमलेश्वर की पहचान-
जनपद की प्रतिभा के रूप में विदेश तक अपनी भर्राई आवाज का चाणक्य सीरियल से डंका बजाने वाले साहित्यकार कमलेश्वर जी ने मैनपुरी की ऐसी ही तरासी हुयी प्रतिभाओं की यादगार में एक फिल्म का फिल्मांकन कराया। जिसमें कलाकार नंदिता ठाकुर, दिनेश सेठी, अमर कक्कड़ जैसे कलाकारों ने पुरानी मैनपुरी की तंग गलियों में बने मकानों में सूटिंग और कलाकारी के बीच फिल्म का निर्माण किया। उस फिल्म का नाम था बदनाम गली जो कमलेश्वर द्वारा लिखित बदनाम बस्ती उपन्यास पर आधारित थी। इसके गाने ‘‘ मेले में खोई गुजरिया और लोण्डा पटवारी का बडा नमकीन’’ लोगों की जुवा पर लम्बे समय तक छाये रहे। किले के मुख्य द्वार पर हुई स्थानीय नौटंकी की याद भी वर्षों तक जहन में गूझती रही।

कमलेश्वर जी के हमराज आज भी कर लेते उनकी याद-
पत्रकारिता जगत में कई पत्रकारों को राह दिखाने वाले भारतभूषण मिश्र, रविन्द्र वर्मा, बृजेश सिंह चैहान, लल्लूसिंह चैहान पूर्व विधायक कविवर लाखन सिंह भदौरिया, सौमित्र जैसी प्रतिभाओं के हमजोली कथाकार कमलेश्वर की वैसे तो कई कहानियां और पुस्तकें पुस्तकालयों में मिल सकती है। परन्तु उनकी एक किताब एक सड़क 57 गलियां इतनी चर्चित रही कि कई बार उसे दोबारा छपाना पड़ा। गंगा जैसी मासिक पत्रिका का संम्पादन और कई फिल्मों में ओमपुरी की भांति अपनी भर्राई आवाज देने वाले कमलेश्वर जी आज हमारे बीच नहीं है परन्तु कटरा मौहल्ले में उनकी यादें और आवाज आज भी लोगों के जहन में गूजती है।

रिपोर्ट- दीपक शर्मा 

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