पेट्रोल पम्पों की अनियमितता पर राज्य सरकार के नर्म रूख पर हाईकोर्ट ने जताई नाराज़गी

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प्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ ब्यूरो : हाईकोर्ट ने पेट्रोल पंपों पर हो रही घटतौली के खिलाफ राज्य सरकार के नरम पड़ते तेवरों पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को तलब कर उन्हें 25 मई को प्रति शपथपत्र देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ अब तक की गई कार्यवाही का ब्यौरा पेश करने का आदेश दिया है। साथ ही शासनादेश जारी कर एसटीएफ को कार्रवाई से हटाने पर नाराजगी भी जताई

उल्लेखनीय है कि मुख्य सचिव ने जिला स्तर पर एक कमेटी बनाने की बात कही जो कि आगे से ऐसी कार्यवाही किया करेगी। कमेटी में उन्ही अफसरों को रखने जिनकी मिलीभगत से घटतौली की बात सामने आई थी, पर कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति है जो पेट्रोल पंपों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होने देना चाहता। कोर्ट ने सरकारी तेल कम्पनियों को भी पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ की गई कार्यवाही का ब्योरा बताने को कहा है

यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल व न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार द्वितीय की बेंच ने डॉ.अशोक निगम व पवन बिष्ट की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर पारित किया। पूर्व आदेश के अनुपालन में राज्य सरकार की ओर से सोमवार को पेश प्रति शपथपत्र को देखने पर कोर्ट ने पाया उसमें जरूरी तथ्यों का राजफाश नहीं किया गया था। एक आयल कंपनी के वकील के यह कहने पर कि यदि पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ कार्रवाई की बात की जायेगी, तो वे हड़ताल पर चले जाएंगे और पिछले दिनों की तरह जनता को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा

इस पर कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि वे ऐसी धमकी देते हैं तो रिसीवर नियुक्त कर पेट्रोल व डीजल बंटवाया जाए। पेट्रोल पंप मालिकों को जनता को ब्लैकमेल करने नहीं दिया जा सकता है। याचियों की ओर से कहा गया कि किसी पेट्रोल पंप मालिक की गिरफ्तारी नहीं की गई। यह भी कहा गया कि सरकार ने एसटीएफ को जांच से भी रोक दिया है और पकड़े जाने पर केवल नाजिल सीज करने का प्रावधान कर दिया है जबकि पहले पूरा पेट्रोल पंप सीज किया जा रहा था। पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाया था और सरकार से पूछा था कि पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। यह भी पूछा था कि उनके खिलाफ क्या आपराधिक कार्रवाई की गई। यदि पेट्रोल पंप मालिक हड़ताल की धमकी देते हैं तो रिसीवर नियुक्त कर लोगों को पेट्रोल-डीजल बंटवाया जाए। -हाईकोर्ट

रिपोर्ट – मिंटू शर्मा

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