आज का इतिहास – महाबली दारा सिंह, पहलवान से हनुमान तक, जो न हुए कभी पराजित

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आज ही के दिन यानि 19 नवंबर को वर्ष 1928 में भारत की पवित्र भूमि ने एक ऐसे बेटे को जन्म दिया था जिसने पूरी दुनिया के बड़े से बड़े योधाओं को पल भर में ही धूल चटा दी और भारत का झंडा जिसके हाथों में रहकर हमेशा विजय की नई-नई ऊँचाइयों को छूता रहा I जी हाँ आज हम बात कर रहे है भारत के विश्व विजेता फ्री स्टाइल कुश्ती में पूरी दुनिया को अपनी भुजाओं का लोहा मनवाने वाले पहलवान स्वर्गीय दारा सिंह जी के बारे में I

इस विश्व विजेता का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के एक गाँव धरमूचक में श्री सूरत सिंह रंधावा और श्री मती बलवंत कौर के घर पर हुआ था I महाबली दारा सिंह ने अपने जीवन की 55 वर्ष की आयु तक पूरी दुनिया में घूम-घूम कर तक़रीबन 500 कुश्तियां लड़ी और हमेशा विजेता बने रहे I दुनिया के किसी भी पहलवान में कभी इतनी ताकत नहीं हुई कि इस भारतीय विश्व विजेता महाबली को पराजित कर पाता I

दारा सिंह का विजय रथ 1947 से सिंगापुर से प्रारंभ हुआ जहाँ पर उन्होंने कुश्ती में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। उसके बाद तो उनके विजय रथ को रोकने साहस पूरी दुनिया में किसी में नहीं था और न ही कोई यह कारनामा कर सका I एक पहलवान के तौर पर पूरी दुनिया में अपनी धाक ज़माने के बाद दारा सिंह 1952 में भारत वापस आ गए और भारत आकर वह वर्ष 1954 में भारतीय कुश्ती के विजेता बने I

dara singhवर्ष 1959 में दारा सिंह ने कलकत्ता में हुई कामनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गारडियान्का एवं न्यूजीलैण्ड के जान डिसिल्वा को धूल चटाकर यह चैम्पियनशिप भी अपने नाम कर ली। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहाँ फ्रीस्टाइल कुश्तियाँ लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर वे फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। उन्होंने पचपन वर्ष तक पहलवानी की और पाँच सौ मुकाबलों में किसी एक में भी पराजय का मुँह नहीं देखा। 1983 में उन्होंने अपने जीवन का अन्तिम मुकाबला जीता और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के हाथों अपराजेय पहलवान का खिताब अपने पास बरकरार रखते हुए कुश्ती से सम्मानपूर्वक सन्यास ले लिया।

दारा सिंह ने कुश्ती के साथ ही साथ अभिनय, निर्देशन और लेखन के क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया है I दारा सिंह को रामानंद सागर की रामायण के किरदार हनुमान से पूरी दुनिया में अपार लोकप्रियता मिली थी I उन्होंने उन्होंने अपनी आत्मकथा मूलत: पंजाबी में लिखी थी जो 1993 में हिन्दी में भी प्रकाशित हुई। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया। वे अगस्त 2003 से अगस्त 2009 तक पूरे छ: वर्ष राज्य सभा के सांसद रहे।

जब कभी किसी ने हार न मानने वाले विश्वविजेता ने जिंदगी से हार मान इस दुनिया से ले ली विदा –

अंत में हर किसी के जीवन की ही तरह वह दिन भी आ गया जिसके सामने किसी की नहीं चलती और 12 जुलाई वर्ष 2012 के दिन सुबह तक़रीबन 7:30 बजे कभी किसी से हार न मानने वाला अपने समय का विश्वविजेता पहलवान आखिरकार चौरासी वर्ष की आयु में अपने जीवन की जंग हार गया।

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