हिन्दुत्व हिन्दू धर्म नहीं है– अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

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दिल्ली : भारत में फासीवाद के दो प्रमुख स्रोत माने जाते हैं: कारपोरेट वित्तीय पूंजी और हिन्दुत्व। हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व में बुनियादी फ़र्क है। यह फ़र्क समझना फासीवाद विरोधी संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है।

 

उक्त बातें स्वराज अभियान के राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहीं।उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म हिन्दू शास्त्रों पर आधारित है। वहीं हिन्दुत्व विनायक दामोदर सावरकर, माधव सदाशिव गोलवलकर और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचार पर आधारित है। हिन्दू धर्म पुरातन है, हिन्दुत्व आधुनिक फासीवादी राजनीतिक विचार है। हिन्दू धर्म को मानना न मानना राष्ट्रवादी होने की शर्त नहीं है, जबकि हिन्दुत्व यानि हिन्दू राष्ट्र न मानने वाला नागरिक दोयम दर्जे का नागरिक होने के लिए अभिशप्त है।

 

हिन्दू धर्म में ढेर सारे सम्प्रदाय और पंथ हो सकते हैं, जबकि हिन्दुत्व में एक पंथ, एक पहचान, एक विधान आवश्यक हैं। सावरकर भी इस पर सचेत हैं कि कहीं हिन्दुत्व को हिन्दूवाद या हिन्दू धर्म न मान लिया जाए। इसलिए वह कहते हैं कि हिन्दूवाद एक वाद के बतौर एक धर्म शास्त्र हो सकता है जबकि हिन्दुत्व एक शब्द नहीं, अपने में एक सम्पूर्ण इतिहास है, हिन्दू जाति है (Hindu Race), हिन्दू राष्ट्र (Hindu Nation) है। वे लिखते हैं सिन्धु राष्ट्र आर्यो का राष्ट्र है जो सप्त सिन्धु से शुरू होकर हिमालय और समुद्र के बीच में फैल गया। यही सिन्धु राष्ट्र आर्यावर्त, ब्रहमावर्त, भारतवर्ष के नामकरण से होते हुए हिन्दू राष्ट्र के नाम तक पहुंचा है। संस्कृत के सिन्धु राष्ट्र को प्राकृत में हिन्दू और ईरानियों, यहूदियों, यवनों की भाषा में हिन्दू राष्ट्र कहा गया। वे कहते हैं कि संस्कृत भाषा के ‘स’ का उच्चारण विदेशी यानि मलेच्छ ‘ह’ के रूप में करते हैं। सावरकर कहते हैं कि सभी हिन्दू भारत के केवल नागरिक इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे मातृभूमि से जुड़े हुए हैं बल्कि उन सबका रक्त भी एक है। वे केवल एक राष्ट्र नहीं एक जाति भी हैं। सबकी नसों में वैदिक पूर्वजों, सिन्धुओं का खून बहता है। आगे वह कहते हैं कि हम लोंगो की एक महान सभ्यता है और हिन्दू संस्कृति है इसलिए राष्ट्रवादी होने के लिए केवल मातृभूमि मानना और एक रक्त सम्बंध होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि हर नागरिक को महान हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को भी मानना होगा। ‘हिंदुस्तान’ को पितृभूमि (Fatherland) और पुण्यभूमि (Holy Land) दोनों मानना जरूरी है। जो इन शर्तों को नहीं मानता है वह हिन्दू राष्ट्र का स्वतंत्र नागरिक नहीं हो सकता।

 

इसका मतलब है वे मुस्लिम, ईसाई या अन्य धर्मावलंबी जो भारत को मातृभूमि मानते हैं लेकिन उनके हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को स्वीकार नहीं करते, वे न तो स्वतंत्र नागरिक हो सकते हैं और न ही राष्ट्रवादी। इस प्रकार सावरकर की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की समझ नस्लीय और निरंकुश है, यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बहुलवादी चरित्र के विरूद्ध है। यहां की सभ्यता और संस्कृति में पितृभूमि मानने का इस तरह का आग्रह नहीं है, यहां के शास्त्रों में भी आमतौर पर मातृभूमि शब्द का उपयोग किया गया है। दरअसल पितृभूमि (Fatherland) यूरोप खासकर जर्मनी से लिया हुआ उधार शब्द है।

 

सावरकर की हिन्दुत्व की इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए ‘हम अथवा हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा में गोलवलकर लिखते हैं, ‘‘आज जर्मनी का राष्ट्रीय गौरव चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। राष्ट्र और उसकी संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिए जर्मनों ने अपने देश को सेमिटिक नस्ली-यहूदियों से मुक्त करके समूची दुनिया को हिला दिया है। यहां राष्ट्रीय गौरव अपने शिखर पर अभिव्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया है कि एक-दूसरे से मूलतः पृथक नस्लों और संस्कृतियों को एक एकल समग्र में समेटना कितना असम्भव है। हमारे लिए यह काफी शिक्षाप्रद है और हमें हिन्दुस्तान में इससे सीखना और लाभ उठाना चाहिए।“ हिटलर के नाजीवाद से सीख लेते हुए हिन्दू राष्ट्र का दर्शन तैयार करते हुए गैर हिन्दू नागरिकों के बारें में गोलवलकर कहते हैं कि ‘इस देश में कुछ न मांगते हुए, किसी सुविधा का हकदार न होते हुए, किसी भी प्रकार की प्राथमिकता पाए बिना, यहां तक कि नागरिकता के अधिकारों के बिना ही हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहें।‘

 

स्पष्ट है सावरकर, गोलवलकर और संघ की राष्ट्र राज्य की आधुनिक अवधारणा विभाजनकारी, आत्मघाती है और राष्ट्रीय आंदोलन के भारत निर्माण के सपनों के विरूद्ध पूरी तौर पर है। जिस तरह से यूरोप के ज्ञानोदय को नाजीवाद-फासीवाद ने नकार दिया था उसी तरह से हिन्दू राष्ट्र की यह अवधारणा समाज सुधार और सामाजिक चेतना की जो भी भारतीय धारा है, उसके विरूद्ध खड़ी होती है। सावरकर मानतें है कि बौद्ध धर्म ने हिन्दू राष्ट्र को पौरुषविहीन बना दिया और विक्रमादित्य ने खोयी हुई हिन्दू राष्ट्र की गरिमा को पुनःस्थापित किया। बौद्ध धर्म के बारे में सावरकर की समझ पूरी तौर पर अनैतिहासिक और पूर्वाग्रही है। बौद्ध धम्म भारत वर्ष में लगभग एक हजार साल से अधिक प्रभावशाली रहा है। जिस चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के काल को वह सिन्धु राष्ट्र का स्वर्णयुग मानते हैं, उसमें भी बौद्ध धर्म की महत्ता बरकरार रही है। तथाकथित हिन्दू सभ्यता के दौर में भी बौद्ध धर्म का जर्बदस्त प्रभाव रहा है। यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत देश में केवल मगध राज ही नहीं, ढेर सारे अन्य राज भी थे, जिनमें बौद्ध धर्म का प्रभाव रहा है। बहरहाल, सावरकर भारतीय राजनीति को हिन्दुत्व की अवधारणा में ढालने और उसका हिंसक स्वरूप उभारने के पक्ष में थे। इसलिए बार-बार इतिहास के मानकों के आधार पर भारत के अतीत की खोज करने की जगह अपनी हिन्दू राष्ट्र के मनोगत भावना के अनुरूप अवैज्ञानिक अनैतिहासिक इतिहास की रचना करते हैं। आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी व उसके अन्य संगठन हिन्दू भावनाओं का दोहन करके मार-पीट और उपद्रव का जो दौर कारपोरेट पूंजी के सक्रिय सहयोग से चला रही है उसकी बुनियाद सावरकर की इसी हिन्दुत्व राजनीति में है। हमारे महाकाव्य रामायण के मिथकीय नायक राम को हिन्दू नस्ल का इतिहास-पुरूष सिद्ध करने का काम सावरकर ने किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसे अंजाम देने के लिए अयोध्या मंदिर निर्माण की नयी मुहिम शुरू कर रहा है, जो साफतौर पर भारतीय राष्ट्र-राज्य निर्माण के लिए विनाशकारी होगा।

 
संक्षेप में हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, जो भारत के आधुनिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। आधुनिक भारत धर्मनिरपेक्ष भारत ही हो सकता है और इस पर विवाद वही लोग कर सकते हैं जो भारत को लोकतांत्रिक देश के बतौर विकसित नहीं होना देना चाहते हैं। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आज जो हिन्दुत्व की ताकतें बढ़ी हैं उसकी वजह हिन्दुस्तान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को यहां वास्तविक अर्थो में न लागू करना है। धर्म और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा और भूमिका भिन्न है और उसे गड्ड-मड्ड नहीं किया जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ और सिर्फ धर्म का राज्य से पूर्ण अलगाव है। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के लिए धर्मनिरपेक्ष राजनीति को धर्म पर निर्भर नहीं होना पड़ता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य अतीत के सभी शुभ और सकारात्मक मूल्यों को समेटे रहता है और वह जनता की भौतिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करता है। जनता की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी है कि धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक मूल्यों की दृढ़ता से रक्षा की जाए। जहां तक धर्म की बात है वह लोंगो का व्यक्तिगत मामला है, उसमें राज्य द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। लोगों को अपने विश्वास के हिसाब से धार्मिक व्यवहार करने की पूरी छूट होनी चाहिए। किसी भी पंथ, सम्प्रदाय को दूसरे पंथ सम्प्रदाय पर अपना विश्वास जबरन नहीं थोपना चाहिए। हिन्दू धर्म में भी इस तरह के मूल्यों की चर्चा है जो कि हिन्दुत्व की राजनीति में कतई नहीं है। दरअसल हिन्दू धर्म की बुनियादी कमजोरी यह है कि वह सामाजिक सम्बंधों का वर्णां व जातियों के रूप में निर्धारण करता है जबकि ऐसी परम्परा ‘श्रमण’ और ‘चार्वाक-लोकायत’ में नहीं देखने को मिलती है। हिन्दू धर्म में इन्हीं अंर्तनिहित कमजोरियों की वजह से ढे़र सारा विभाजन हुआ और उसके सुधार के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू हुए।
बहरहाल धर्म का बने रहना न रहना परिस्थितियों पर निर्भर करता है क्योंकि सामाजिक विकास की खास परिस्थिति में धर्म पैदा हुआ है, बुनियादी तौर पर उन परिस्थितियों को बदलने में ही नयी वैज्ञानिक चेतना लोगांे में जन्म लेती है। जब तक मनुष्य का स्वयं से, समाज और प्रकृति से अलगाव बना रहता है उसकी चेतना में धर्म भी बना रहता है। उसे बलात् नहीं हटाया जा सकता है। मार्क्स का यह कहना कि ‘धार्मिक व्यथा एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों ही है। धर्म उत्पीडि़त प्राणी की आह (उच्छ्वास) है, निर्दय संसार का मर्म है तथा साथ ही निरूत्साह परिस्थितियों का उत्साह भी है। यह जनता की अफीम है।

 

जनता के प्रतिभासिक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है उसके वास्तविक सुख की मांग करना। मौजूदा हालात के सम्बंध में भ्रमों का परित्याग करने की मांग उन हालात का परित्याग करने की मांग करता है जिनके लिए भ्रम जरूरी बन गये हैं। इसलिए धर्म की आलोचना भ्रूण रूप में आंसुओं की घाटी, धर्म जिसका प्रभामण्डल है, की आलोचना है’, आज भी सटीक है।
फासीवाद विरोधी संघर्ष के इस दौर में हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के फासीवादी आतंकी राजनीति के बीच फर्क को रेखांकित करना बेहद जरूरी है। समाज के सभी तबकों, समुदायों, वर्गां, आंदोलनों, व्यक्तियों को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के आधार पर एकताबद्ध करना और फासीवादी राजनीति को शिकस्त देना ऐतिहासिक जरूरत है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।

 

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